SAC के पेपर “इस्कॉन में ब्रह्म-गायत्री मंत्र” को हमारी प्रतिक्रिया — भाग 2
श्यामसुन्दर दास (श्रील प्रभुपाद के शिष्य), ज्योतिष
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सारोद्धार
श्रील प्रभुपाद द्वारा महिला शिष्यों को ब्रह्म-गायत्री मंत्र प्रदान करने का निर्णय इस्कॉन के इतिहास में सबसे चर्चित विषयों में से एक है। क्या यह एक सैद्धांतिक बदलाव था या किसी दबावपूर्ण परिस्थिति की प्रतिक्रिया? यह शोध-पत्र (paper) ऐतिहासिक लेखों-जोखों और प्रत्यक्ष गवाहियों की जांच करता है, जो दर्शाता है कि प्रभुपाद का निर्णय एक नैतिक दुविधा – (धर्म- संकट) से उत्पन्न हुआ था, न कि एक अभूतपूर्व मिसाल कायम करने के लिये। SAC दाता करता है कि यह निर्णय महिलाओं के आध्यात्मिक लाभ के लिए था, किन्तु इसके विपरीत साक्ष्य यह बताते हैं कि यह निर्णय इस्कॉन के शुरुआती वर्षों में आ रही विशिष्ट चुनौतियों के प्रति एक अनिच्छुक समझौता था। और आगे इस अध्ययन में SAC की चुन चुन कर रखी गई गवाहियों पर निर्भरता और SAC की ऐतिहासिक घटनाओं की पुनर्व्याख्या करने पर आलोचना की गई है, तथा इसके निष्कर्षों में विसंगतियों पर प्रकाश डाला गया है। शास्त्रीय रूढ़िवादिता की ओर लौटने का समर्थन करते हुए यह शोध-पत्र समकालीन चुनौतियों के समाधान के साथ सैद्धांतिक अखंडता को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर देता है। यह लेख परम्परागतता, वर्तमान से सामञ्जस्य, तथा संस्थागत निरंतरता को बनाये रखने हेतु चल रहे इस्कॉन के संघर्ष के विषय में महत्वपूर्ण अन्तर्दृष्टि प्रदान करता है।
संक्षिप्त मुद्दे
SAC अपनी थीसिस इस सिद्धांत पर आधारित करता है कि श्रील प्रभुपाद ने महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री दी क्योंकि यह उनके आध्यात्मिक जीवन के लिए लाभप्रद थी। किन्तु हम दिखाएंगे कि श्रील प्रभुपाद ने इसे एक अलग ही कारण से दिया था। इस प्रकार SAC की थीसिस निरस्त हो जाती है। शुरुआती दिनों में, श्रील प्रभुपाद की कुछ महिला शिष्याएँ नाराज थी जिन्होंने दूसरी दीक्षा न मिलने के कारण विद्रोह कर दिया था। उनको शांत करने के लिए श्रील प्रभुपाद ने अपनी महिला शिष्याओं को उपवीत के बिना ही ब्रह्म-गायत्री देने की प्रथा शुरू की, यह दर्शाते हुए कि वे वास्तविक ब्राह्मण नहीं थीं। इस इतिहास को अपने तर्क के लिए घातक जानते हुए SAC ने “आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर,”1 एक नारीवादी मिथ्याकथा बनाकर, USA में प्रथम बार हुए दूसरी-दीक्षा के इतिहास को गलत बताया। उन्होंने पहले के अभिलेखों और साक्ष्यों की उपेक्षा की, तथा इसके स्थान पर गोविंद और जदुरानी दासी के हाल के विरोधाभासी बयानों को प्राथमिकता दी, जो SAC की राजनीतिक विचारधारा से मेल खाते हैं।
गोविंद दासी की तोड़ी-मरोड़ी वर्तमान कथा में पुरुष भक्तों पर झूठा आरोप लगाया गया है कि उन्होंने श्रील प्रभुपाद के बीमार होने के बावजुद भी उनपर दबाव डाला कि वे पुरुष भक्तों को ब्रह्म-गायत्री मन्त्र प्रदान करें। इस लेख में हम उन भक्तों की प्रत्यक्ष रूप से दर्ज की गई गवाही प्रस्तुत करते हैं जो इस समारोह में उपस्थित थे, साथ ही लिखित दस्तावेज भी, जो दर्शाते हैं कि एक नारीवादी आंदोलन उठ खड़ा हुआ था, जिसके कारण श्रील प्रभुपाद को महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री न देने के अपने प्रारंभिक निर्णय पर पुनर्विचार करना पड़ा। कारण यह नहीं था कि ब्रह्म-गायत्री देना महिला शिष्यों के आध्यात्मिक जीवन के लिए लाभकारी “सिद्धांत” था। श्रील प्रभुपाद कहते हैं कि महिला शिष्याएँ इसे प्राप्त करें इसमें “कोई नुकसान” नहीं — ऐसी प्रथा को जारी रखने के लिए यह बहुत ही कमजोर समर्थन है।
इसके अतिरिक्त, हम SAC द्वारा अविश्वसनीय कथानकों पर निर्भरता तथा नारीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए झूठे रणनीतिक क्रियाकलापों के उदाहरणों की भी जांच करते हैं।
हम “धर्म-संकट” पर भी चर्चा करते हैं जिसका सामना श्रील प्रभुपाद ने अपने आरंभिक दिनों में किया था, और जिसके कारण उन्हें यह सोचना पड़ा कि, “कभी-कभी मैंने कुछ ऐसा किया है जो मुझे नहीं करना चाहिए था।” अंत में, हम तर्क देते हैं कि महिला शिष्यों को ब्रह्म-गायत्री देने की प्रथा क्यों बंद होनी चाहिए।

प्रस्तावना
प्रिय महाराज, प्रभु और माताएँ,
कृपया मेरा विनम्र प्रणाम स्वीकार करें। श्रील प्रभुपाद की जय हो।
SAC ने अवैध ऐतिहासिक पुनर्रचना में भाग लिया है जो उनके वैचारिक उद्देश्यों को पूरा कर सकें, जिसमें वह अपने रुख को सही ठहराने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है। यह प्रतिलेख SAC के पेपर, “इस्कॉन में ब्रह्म-गायत्री-मंत्र” (इस लिंक से डाउनलोड करें) के प्रति मेरी प्रतिक्रिया का भाग 2 है। जबकि मेरी प्रतिक्रिया के भाग 1 ने एक दार्शनिक आलोचना प्रदान की, यह खंड ऐतिहासिक और तथ्यात्मक अशुद्धियों में तल्लीन होकर हेरफेर और धोखे के उदाहरणों को उजागर करता है। सत्य को बनाए रखने और श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं की अखंडता को बनाए रखने के लिए इन विकृतियों का सामना करना महत्वपूर्ण है।
जो आंदोलन अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए छल-कपट पर निर्भर होते हैं, वे मूल रूप से दोषपूर्ण होते हैं, क्योंकि वे सत्ता या प्रभाव के लिए ईमानदारी और निष्ठा का त्याग करते हैं। इससे न केवल आंदोलन को बल्कि उन लोगों को भी दीर्घकालिक नुकसान होता है, जिनका प्रतिनिधित्व या मदद करने का दावा आन्दोलन खुद करता है। दांव ऊंचे हैं, क्योंकि ये झूठ न केवल ऐतिहासिक अभिलेखों को विकृत करते हैं, बल्कि भक्तों के आध्यात्मिक जीवन को भी प्रभावित करते हैं। निम्नलिखित विश्लेषण SAC के दावों की सावधानीपूर्वक जांच करता है, ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत करता है जो उनके कथन को चुनौती देते हैं और उन खतरों को भी उजागर करता है जो विकृतियों को आधार देने हेतु तथाकथित सैद्धान्तिक रचना से उत्पन्न होते है।
दास दासनुदास
श्यामसुंदर दास ACBSP, ज्योतिष
कृष्णे मतिर् अस्तु
“जो अतीत को नियंत्रित करता है, वह भविष्य को नियंत्रित करता है। और जो वर्तमान को नियंत्रित करता है, वह अतीत को नियंत्रित करता है।”
जॉर्ज ऑरवेल – 19842
परिचय
इस साल की शुरुआत में मैंने सोशल मीडिया पर दो भक्तों के बीच बातचीत देखी, जिसमें श्रील प्रभुपाद द्वारा महिला शिष्यों को पहली बार ब्रह्म-गायत्री दिए जाने के बारे में चर्चा रही थी। “भक्त 1” विभिन्न प्रलेखित स्रोतों में पहले से ही दर्ज सर्वस्वीकृत इतिहास बताता है। जबकि “भक्त 2” SAC के पेपर में पुनर्लिखित “इतिहास” के आधार पर जोर से जवाब देता है।
भक्त 1: उस प्रथम ब्राह्मण-दीक्षा समारोह में उन्होंने [श्रील प्रभुपाद ने] उन संकेतों को दो माताओं द्वारा विद्रोह के भाग के रूप में देखा। इसलिए, उन्होंने उपवीत (पवित्र-धागे) के बिना अकेले मंत्र देने का फैसला किया।
भक्त 2: यह (विचार) इतना कपटपूर्ण है कि मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह अपराध है। मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि मैं आपके और ऐसे अन्य लोगों के लिए प्रार्थना करने के लिए अपनी सच्ची सहानुभूति जुटाऊँगा जो इस तरह की बकवास करते हैं। आप जो कहते हैं उसके लिए कोई सबूत नहीं है। इसके अलावा, उस समय शामिल सभी लोगों ने पुष्टि की है कि ऐसा दावा पूरी तरह से झूठा है। इसके अलावा यह तो काल्पनिकता की हद होगी कि एक पल के लिए भी यह सोचा जाए कि इन युवा भक्तों में श्रील प्रभुपाद पर दबाव डालने की इच्छा और हिम्मत होगी, ऐसा करने में सफल होने की तो बात ही छोड़िए। साफ सच यह है कि आप हवा में हाथ पैर मार रहे हैं और इस प्रक्रिया में अपराध बटोर रहे हैं। मैं आपसे (आपकी अपनी भलाई के लिए) यहां, तुरंत रुकने का आग्रह करूँगा।
ऐसा कैसे हुआ कि सर्वस्वीकृत ऐतिहासिक कथन को उलट दिया गया और अब इसे अपराध माना जाने लगा ? आइए जानें।
जब नारीवादी अतीत को नियंत्रित करते हैं
मार्क्सवादियों और नारीवादियों की एक पसंदीदा छल-कपट की रणनीति है — अतीत को नियंत्रित करना,3 नारीवादी दृष्टिकोण से इतिहास को पुनः लिखना और फिर अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उस इतिहास को हथियार बनाना। ( परिशिष्ट “धोखाधड़ी एक नारीवादी रणनीति है” भी देखें।) और यही SAC ने किया है। SAC के पेपर के एक खंड का शीर्षक है, “पहली बार जब श्रील प्रभुपाद ने अपने शिष्यों को गायत्री-दीक्षा दी: वास्तविक इतिहास” (पृष्ठ 103-109)। इसमें SAC नारीवादी काल्पनिक इतिहास को गढ़ने के लिए घटनाओं को तोड़ता-मरोड़ता है।
SAC के दावे स्पष्ट रूप से झूठ पर आधारित हैं। उनका दावा है कि गोविंद दासी प्रथम ब्राह्मण-दीक्षा समारोह में अनुपस्थित रही थी क्योंकि वे खिन्न थी कि पुरुष भक्त श्रील प्रभुपाद के बीमार होने के बावजूद भी उनपर उनको ब्राह्मण दीक्षा देने के लिये दबाव डाल रहे थे। SAC का इस बदले हुए विवरण पर भरोसा ऐतिहासिक सटीकता के प्रति उनकी उपेक्षा को उजागर करता है:
6 मई को श्रील प्रभुपाद कुछ पुरुष शिष्यों को गायत्री मंत्र दे रहे थे। गोविंद दासी शुरू में दूर रहीं क्योंकि वे इस बात से परेशान थीं कि पुरुषों ने श्रील प्रभुपाद से गायत्री मंत्र मांगा था जबकि वे बीमार थे।
पृष्ठ 103
और फिर बाद में पृष्ठ 107 पर उसी झूठ को दोहराते हुए,
वह [सत्सवरूप महाराज] कहते हैं कि गोविंद दासी इसलिए देर से आई क्योंकि वह इस बात से परेशान थीं कि उन्हें दीक्षा में शामिल नहीं किया गया और उन्होंने बीमारी का बहाना बनाया, लेकिन गोविंद दासी कहती हैं कि वह इसलिए देर से आई क्योंकि वह इस बात से परेशान थीं कि कुछ भक्तों ने प्रभुपाद के बीमार होने के बावजूद भी उन पर दीक्षा देने के लिए दबाव डाला था।
“असत्य से अधिक पापपूर्ण कोई वस्तु नहीं है। इसी कारण एक बार धरती माता ने कहा, ‘मैं किसी भी भारी वस्तु को सहन कर सकती हूँ, सिवाय उस व्यक्ति के जो झूठ बोलता है।’”
श्रीमद्भागवतम् 8.20.4
लेकिन SAC की चाल इस रिकॉर्ड की गई यूट्यूब बातचीत से खुली पड़ जाती है, जिसमें गोविंद दासी खुद हमें बताती हैं कि क्या हुआ था। इसमें इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि श्रील प्रभुपाद पर बीमार होने के दौरान पुरुषों द्वारा दीक्षा देने के लिए दबाव डाला गया था जो स्वयं अनुपस्थिति का कारण बना। बल्कि इस बात का उल्लेख जरूर है कि स्वयं को दीक्षा से बाहर रखे जाने के कारण अत्यधिक क्रोध आया था जिसके चलते वह समारोह में अनुपस्थित रही — यह एक ऐसा ऐतिहासिक विवरण है जो अनेक साक्ष्यों से मेल खाता है।
गोविंद दासी: गौरसुंदर इस गायत्री मंत्र को प्राप्त करने के लिए बहुत इच्छुक था, इसलिए उसने प्रभुपाद से इस बारे में बात की। वह हर तरह की चीजें पढ़ रहा था। इसलिए प्रभुपाद उसे गायत्री मंत्र देने और दूसरी दीक्षा देने के लिए सहमत हो गए। तो मैं उससे सड़क पर मिली और उसने अपने सारे बाल मुंडवा लिए थे, इससे मुझे बहुत चिन्ता हो गई। लेकिन उस रात उसे गायत्री मंत्र की दीक्षा मिलने वाली थी, और मैं परेशान थी क्योंकि वे गौरसुंदर को मंत्र देने वाले थे लेकिन वे मुझे नहीं देने वाले थे। इसलिए मुझे बहुत अकेलापन महसूस हुआ। इसलिए जब दीक्षा समारोह में जाने का समय आया, तो मैंने कहा, “मेरी सेहत अच्छी नहीं है इसलिए मैं नहीं जाऊँगी।” मैं नाराज़ थी। और फिर उनके जाने के बाद, मैंने खुद से सोचा, “मैं क्या कर रही हूँ? मैं वहाँ अनुपस्थित रहना नहीं चाहती!” इसलिए मैं दरवाज़े से बाहर भागी और मंदिर तक 10 ब्लॉक की दूरी तय की और मंदिर में घुस गई, और प्रभुपाद वहाँ बैठे दीक्षा दे रहे थे। उन्होंने ऊपर देखा और कहा, “आह, गोविंद दासी, मैं सोच रहा था कि तुम कैसे दूर रह सकती हो। तुम्हें मेरा प्रवचन सुनना बहुत पसंद है।” क्योंकि वे चाहते थे कि मैं आऊँ, लेकिन मैं पागल थी। मैं इस बात से बहुत परेशान थी। और इसलिए क्योंकि मैं थोड़ी परेशान थी, उन्होंने फैसला किया कि लड़कियों को भी गायत्री मंत्र मिलना चाहिए। जदुरानी अधिक परेशान थी। और इसलिए उन्होंने हमें अगली शाम को गायत्री मंत्र के साथ दीक्षा दी क्योंकि वे जानते थे कि इस देश में लड़कियों और लड़कों को एक ही तरह से शिक्षित किया जाता है।
फोलोइंग श्रील प्रभुपाद – डीवीडी 1
गोविंद दासी हमें बताती हैं कि उनके दीक्षा समारोह में न जाने का वास्तविक कारण यह था कि वे बहुत परेशान थीं (और जदुरानी तो और भी अधिक परेशान थीं), कि केवल पुरुषों को ही गायत्री मंत्र मिल रहा था , उन्हें नहीं। और क्योंकि लड़कियाँ परेशान थी, इसलिए श्रील प्रभुपाद ने लड़कियों को गायत्री मंत्र देने का निर्णय लिया।4
प्रद्युम्न प्रभु ने पुष्टि की कि महिलाएं बहुत क्रोधित थीं और उन्होंने मंदिर का बहिष्कार कर दिया था:
प्रद्युम्न दास: उस बोस्टन यात्रा के दौरान, लगभग हर हफ़्ते न्यूयॉर्क से नए चेहरे आते थे। न्यूयॉर्क के सभी भक्त आते थे — ब्रह्मानंद, रायराम, रूपानुग। बोस्टन मंदिर हमेशा एक छोटा मंदिर रहा था – तीन लोग, दो लोग, पाँच लोग, छह लोग, लेकिन कभी भी पाँच या छह से ज़्यादा नहीं। लेकिन प्रभुपाद की यात्रा के दौरान, यह मंदिर ज़्यादातर न्यूयॉर्क के भक्तों से भरा हुआ था। मुझे याद है कि ब्राह्मण-दीक्षा के अगले दिन हम सब टहलने गए थे, मैं भी वहाँ था, और मैंने मज़ाक में कहा, “बोस्टन के ब्राह्मण।” प्रभुपाद ने कहा, “हाँ, बोस्टन के ब्राह्मण।” हममें से छह लोगों को पहली दीक्षा में जनेऊ मिला – छह पुरुष और कोई महिला नहीं। फिर उन्होंने हंगामा किया और वे नहीं आए। वे इतने नाराज़ थे कि उन्हें दूसरी दीक्षा नहीं मिलने वाली थी, वे नहीं आए।
फोलोइंग श्रील प्रभुपाद – डीवीडी 1
अगले वीडियो में जदुरानी दासी ने इस बात की पुष्टि की है कि गोविंद दासी ने क्यों भाग नहीं लिया। यह वैसा नहीं था जैसा कि SAC दावा करता है, कि श्रील प्रभुपाद बीमार थे और पुरुषों द्वारा उन्हें दीक्षा लेने के लिए मजबूर किया गया था:
जदुरानी दासी: मुझे नहीं पता था कि मुझे दूसरी दीक्षा नहीं मिल रही है इसलिए मैं मंदिर में थी। लेकिन गोविंद दासी, प्रभुपाद की निजी सेविकाओं में से एक, वहाँ नहीं थी क्योंकि उसे पता था कि उसे दूसरी दीक्षा नहीं मिलने वाली है, और उसे बुरा लगा। वह देर से आई। सामने के दरवाज़े के पास हवन हो रहा था, और जब वह अंदर आई तो प्रभुपाद ने ऊपर देखा और कहा, “ओह, मैं बस सोच रहा था, ‘वह लड़की कहाँ है?’ और कृष्ण ने तुम्हें भेज दिया।”
श्रील प्रभुपाद संस्मरण, आईटीवी, सिद्धांत दास, अध्याय 20
और अगले वीडियो में बलाई माताजी बताती हैं कि कैसे जदुरानी दासी के कला विभाग में सहायक माधवी लता दासी ने “जोर दिया कि महिलाओं को, और विशेष रूप से उन्हें, गायत्री मंत्र दिया जाए।”
बलाई: मेरी समझ से, श्रील प्रभुपाद लड़कियों को गायत्री-मंत्र नहीं देना चाहते थे। उस समय भारत में लड़कियों को गायत्री मंत्र नहीं दिया जाता था। लेकिन एक बहुत ही मुँहफट महिला, माधवी लता दासी ने जोर देकर कहा कि महिलाओं को, खासकर उन्हें, गायत्री मंत्र दिया जाना चाहिए। श्रील प्रभुपाद, एक शुद्ध भक्त होने के नाते, समय और परिस्थिति के अनुसार पूर्व के रीति-रिवाजों में समायोजन कर सकते थे। इसलिये उन्होंने सभी महिलाओं को गायत्री मंत्र दिया। यह समायोजन आवश्यक था क्योंकि बहुत सी महिलाएँ पुजारी का काम करती थीं और अब भी करती हैं, जो कि भारत में नहीं किया जाता था, लेकिन श्रील प्रभुपाद ने अमेरिका में इसकी अनुमति दी। [यह गलत है, जैसा कि हमने SAC को दिए गए अपने जवाब के भाग 1 में बताया था कि अर्चविग्रह पूजा करने के लिए ब्रह्म-गायत्री आवश्यक नहीं है।]
श्रील प्रभुपाद स्मरण, सिद्धांत दास, आईटीवी, अध्याय 48
ऐसा प्रतीत होता है कि इस विरोध में दो से अधिक महिलाएँ शामिल थीं, विशेषकर चूँकि माधवी लता दासी जदुरानी दासी की करीबी सहयोगी थीं और उनका पक्ष ले रही थीं। माधवी लता दासी के बारे में बाद में और जानकारी दी जाएगी।
पृष्ठ 104 पर SAC ने जदुरानी दासी को उद्धृत किया है ,
“ब्रह्मानन्द ने सुझाव दिया कि श्रील प्रभुपाद ने हम लड़कियों को ब्राह्मण दीक्षा सिर्फ़ इसलिए दी थी क्योंकि वे अपने दिल में जानते थे कि हम परेशान हैं और वे हमें खुश करना चाहते थे। मुझे इस बात पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ।”
जदुरानी दासी सुझाती है कि ब्रह्मानन्द प्रभु झूठे हैं 5 और वह भी उनके निधन के बाद, जिस समय वे अपना बचाव करने में असमर्थ हैं। श्रील प्रभुपाद ने ब्रह्मानन्द प्रभु को “हमारे मिशन का पर्वत” कहा।6 उन्होंने बताया कि शुरुआत में वे आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे थे लेकिन ब्रह्मानन्द प्रभु शामिल हो गए और तुरंत अपना पूरा वेतन देने की पेशकश की। “उनके शामिल होने के बाद मुझे थोड़ी राहत मिली … जब ब्रह्मानन्द आए तो मुझे थोड़ी राहत मिली … मैंने उन्हें अध्यक्ष बना दिया। वे बहुत ही संत व्यक्ति हैं।”7
और मंदिर के अध्यक्ष के रूप में ब्रह्मानन्द श्रील प्रभुपाद के दाहिने हाथ थे, एक अंतरंग विश्वासपात्र थे, और उनके मूड के अनुकूल थे।
ब्रह्मानन्द प्रभु के विषय में हमें किसका आकलन स्वीकार करना चाहिए — जदुरानी का (कि वे झूठे हैं) या श्रील प्रभुपाद का (कि वे बहुत संत हैं)?
और, इस मामले में, ब्रह्मानंद प्रभु सही थे क्योंकि ऊपर उद्धृत गोविंद दासी उनसे सहमत हैं कि श्रील प्रभुपाद ने लड़कियों को ब्राह्मण-दीक्षा क्यों दी — क्योंकि लड़कियाँ परेशान थीं और वे उन्हें खुश करना चाहते थे। गोविंद दासी: “लेकिन मैं पागल थी। मैं इस बात से बहुत परेशान थी। और इसलिए क्योंकि मैं थोड़ी परेशान थी, उन्होंने फैसला किया कि लड़कियों को भी गायत्री-मंत्र दिया जाना चाहिए। “
या तो जदुरानी दासी की याददाश्त खराब है, या फिर वह अपनी कहानी को बेहतर दिखाने के लिए उसे गलत तरीके से पेश कर रही है। किसी भी मामले में, वह एक विश्वसनीय संस्मरणकर्ता नहीं है।
तो उपरोक्त रिकॉर्डिंगों में वर्णित स्थिति एक दूसरे से मेल खाती है — महिलाएँ इस बात से नाराज़ थीं कि उन्हें ब्राह्मण दीक्षा नहीं मिली, इसलिए उन्होंने मंदिर का बहिष्कार किया; उन्हें शांत करने के लिए श्रील प्रभुपाद ने उन्हें मंत्र तो दिया, लेकिन उपवीत (जनेऊ) नहीं दिया।
सत्स्वरूप दास गोस्वामी ने श्रील प्रभुपाद-लीलामृत में इस स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया है:
गोविंद दासी बीमार होने का बहाना बनाकर दीक्षा लेने नहीं गई थीं। हालांकि उन्होंने प्रभुपाद को नहीं बताया था, लेकिन वे इस बात से दुखी थी कि वे महिलाओं को ब्राह्मण दीक्षा नहीं दे रहे थे। निराश होकर वे स्वामीजी के अपार्टमेंट में ही रोती रहीं। हालांकि, एक घंटे के बाद, उन्होंने फैसला किया कि इस तरह मूर्खतापूर्ण व्यवहार करके वे प्रभुपाद की वाणी सुनने से चूक रही हैं। इसलिए वे जल्दी से घर से बाहर निकलीं और मंदिर की ओर दौड़ीं, और समारोह के अंत के करीब पहुंची। जैसे ही वे अंदर गई, प्रभुपाद ने ऊपर देखा। “ओह,” उन्होंने कहा, “मैं बस यही सोच रहा था, ‘वह लड़की कहाँ है?’ और कृष्ण ने उसे भेज दिया।”
समारोह के बाद गोविंद दासी ने जदुरानी से बात की, जिसको भी अवमानित महसूस हुआ था। प्रभुपाद उनकी मानसिकता को समझ गए, हालांकि उन्होंने अपनी शिकायत खुलकर नहीं बताई। अगली सुबह उन्होंने गौरसुंदर और गोविंद दासी से कहा कि उन्हें महिलाओं को गायत्री-मंत्र देने में कोई नुक्सान नहीं दिखता, लेकिन वे पवित्र धागा नहीं प्राप्त कर सकतीं। उसी रात, उन्होंने एक अलग समारोह आयोजित किया, जिसमें गोविंद दासी और जदुरानी को गायत्री-मंत्र की दीक्षा दी गई।
श्रील प्रभुपाद-लीलामृत खंड 2, अध्याय 58 “बोस्टन की यात्रा”8
यह वर्णन गोविंद दासी, जदुरानी दासी, और प्रद्युम्न प्रभु के रिकॉर्डेड विवरण में व्यक्त मनोदशा को सटीक रूप से दर्शाता है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि श्रील प्रभुपाद ने यह नहीं कहा कि इससे महिलाओं को लाभ होगा, लेकिन ऐसा कि उन्हें इसे देने में कोई नुक्सान नहीं दिखता — एक बड़ा अंतर है।
और Living with the Scriptures नामक अपनी पुस्तक में सत्स्वरूप दास गोस्वामी लिखते हैं:
अगली सुबह प्रभुपाद ने दूसरा ब्राह्मण दीक्षा समारोह आयोजित किया। यह महिलाओं के लिए था, क्योंकि उन्होंने उन्हें शामिल नहीं किये जाने के मामले में नारीवादी विरोध किया था। इसके तुरंत बाद, न्यूयॉर्क और मॉन्ट्रियल दोनों से भक्तों के समूह दूसरी दीक्षा प्राप्त करने के लिए आए। इस प्रकार कई अवसरों पर हमें श्रील प्रभुपाद से ब्राह्मण के अर्थ और पश्चिम में जन्मे लोगों को यह दर्जा देने की प्रामाणिकता के बारे में व्याख्यान सुनने को मिला।
Living with the Scriptures “IX: The Boston Brāhmaṇas”9
उन्होंने इसे “नारीवादी विरोध” क्यों कहा? क्योंकि उग्रवादी “द्वितीय-तरंग नारीवाद” 1960 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ था। यह इस्कॉन के प्रारंभिक वर्षों का युग था। और जबकि अधिकांश नए लोग, पुरुष और महिला, हिप्पी चेतना से ओतप्रोत थे, कई महिलाएं नारीवादी चेतना के अतिरिक्त बोझ के साथ आई थी।
श्रील प्रभुपाद की पश्चिमी महिला शिष्या स्त्री-धर्म में प्रशिक्षित नहीं थीं। मासिक धर्म के संबंध में गौड़ीय-मठ प्रथाओं के बारे में सोचें ( नीचे देखें )। श्रील प्रभुपाद की किसी भी गुरु-बहन ने ब्रह्म-गायत्री प्राप्त नहीं की। तो श्रील प्रभुपाद इस संबंध में श्रील भक्तिसिद्धांत के खिलाफ कैसे जा सकते थे जब तक कि उनकी पश्चिमी महिला शिष्याओं की ओर से कोई दबाव न हो? यदि उन्हें स्त्री-धर्म में प्रशिक्षित किया गया होता तो कभी कोई समस्या नहीं होती। लेकिन वे नारीवादी थीं, जैसा कि कुछ आज भी हैं (जो उनके व्यवहार से पता चलता है)।

प्रद्युम्न प्रभु से वार्तालाप |
1998 में मैंने GBC की ओर से प्रद्युम्न प्रभु को फोन किया था। GBC ने मेरी सिफारिश पर सहमति जताई थी कि वे प्रद्युम्न से 1978 में सत्स्वरूप दास गोस्वामी को लिखे गए उनके दूरदर्शी पत्र की उपेक्षा करने के लिए क्षमा मांगेंगे। खैर, हमारी लंबी सूनी बातचीत के दौरान, उन्होंने मुझे बताया कि वे USA में हुए पहले ब्राह्मण-दीक्षा समारोह में उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि श्रील प्रभुपाद महिलाओं को ब्राह्मण-दीक्षा नहीं देना चाहते थे। तो वे युवतियां अत्यधिक क्रोधित हुई और उन्होंने मंदिर का बहिष्कार करते हुए विरोध का प्रदर्शन किया। (इस बात से चिंतित होकर कि उनका नवजात आंदोलन ऐसी विद्रोही प्रवृत्ति से बाधित था) श्रील प्रभुपाद ने एक और दीक्षा समारोह करके लड़कियों को शांत किया जिसमें उन्होंने उन्हें ब्रह्म-गायत्री-मंत्र दिया लेकिन पवित्र-धागा (उपवीत/जनेऊ), जो कि एक ब्राह्मण का प्रतीक है, वह उन्हें नहीं दिया।
जब यह प्रश्न उठा कि श्रील प्रभुपाद ने उन्हें मंत्र तो दिया, लेकिन पवित्र-धागा नहीं दिया, तो हम दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि श्रील प्रभुपाद उन शिष्यों द्वारा कुछ ऐसा करने के लिए दबाव में थे जो वे नहीं चाहते थे। ऐसे शिष्य भगवान कृष्ण की वैदिक संस्कृति पालन करने के संबंध में अंदर से सांस्कृतिक-चुनौती का सामना कर रहे थे। श्रील प्रभुपाद नहीं चाहते थे कि उनके नवजात आंदोलन को इसके प्रारंभ में ही बाधा पहुंचे, इसलिए उन्होंने मंत्र तो दिया, लेकिन धागा नहीं दिया।10 हमने इस संभावित तर्क की भी जांच की कि श्रील प्रभुपाद का महिलाओं को पवित्र-धागा न देने का निर्णय भविष्य में अधिक बुद्धिमान् व्यक्तियों के लिए एक सूक्ष्म संकेत के रूप में काम कर सकता है कि महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री मंत्र देने की प्रथा जारी नहीं रहनी चाहिए।
भिन्न-भिन्न गवाहियों की समय-रेखा महत्वपूर्ण
SAC आपत्ति कर सकती है, “लेकिन हम इतिहास को गलत नहीं बता रहे हैं; हमने गोविंद दासी से पूछा और वह यह कह रही हैं; वह इतिहास बदल रही हैं। आप हम पर इतिहास बदलने का आरोप क्यों लगाते हैं?”
हम जवाब देते हैं: 2023 के SAC के इस ब्रह्मगायत्री पेपर के प्रकाशित होने तक, विभिन्न प्रलेखित स्रोतों में दर्ज और सर्वस्वीकृत विवरण यह था कि एक नारीवादी विद्रोह हुआ था और उन्हें खुश करने के लिए श्रील प्रभुपाद ने उन्हें बिना धागे के ब्रह्म-गायत्री दी थी। लेकिन अब SAC इस इतिहास को पलट देता है ताकि काल्पनिक कारणों को स्थापित किया जा सके कि श्रील प्रभुपाद ने महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री क्यों दी। इस हेतु SAC गोविंद दासी और जदुरानी दासी के “इतिहास” के नए विपरीत वर्णन को उत्साहपूर्वक स्वीकार कर लेती है, बिना उचित परिश्रम और बिना उनके स्रोतों की उचित जांच किए।
हर कोई जानता था कि पुराना इतिहास क्या था। सवाल यह है कि SAC ने नए संस्करण पर इतनी आसानी से विश्वास क्यों कर लिया? क्या एक भक्त का निम्नलिखित अनुभव इससे संबंधित हो सकता है?
FDG (स्त्री-दीक्षा-गुरु) के मुद्दे से निपटने के अपने अनुभव में, मैंने देखा कि FDG के समर्थकों का सबसे कमज़ोर पासा यह था कि हमने पहले ब्राह्मण-दीक्षा समारोह की घटना की ओर इशारा किया था। FDG के समर्थक इस बिंदु का उत्तर देने से भाग रहे थे और उन्होंने कभी भी सत्स्वरूप महाराज द्वारा कही गई बातों को गलत साबित करने की कोशिश नहीं की। केवल SAC के इस पेपर को लिखने के दो साल के प्रयास के बाद ही वे बोलने के लिए कुछ लेकर आ पाए हैं, और वह सबूत भी बहुत कमज़ोर है, जो दर्शाता है कि वे जानते हैं कि उनका तर्क खोखला है। 11
ऐसा प्रतीत होता है कि SAC का काम सत्य की खोज करना नहीं, बल्कि नारीवादी मिथ्या-घटनाएं गढ़ना है।
“यदि झूठ को बार-बार छापा जाए तो वह अर्धसत्य बन जाता है, और यदि ऐसे अर्धसत्य को बार-बार दोहराया जाए तो वह विश्वास का विषय बन जाता है, एक सिद्धांत बन जाता है, और लोग उसके लिए मरने को भी तैयार हो जाते हैं।”12
ईसा ब्लाग्डेन
यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वीडियो, “Following Śrīla Prabhupāda — DVD 1” यदुबर प्रभु द्वारा 25 अक्टूबर, 2002 को प्रकाशित किया गया था और उसमें “Śrīla Prabhupāda Remembrances” ट्रैक से गोविंद दासी और प्रद्युम्न प्रभु की बहुत पुरानी आडियो रिकॉर्डिंग का उपयोग करके प्रकाशित किया गया था। 13 सिद्धांत प्रभु की “Śrīla Prabhupāda Remembrances” ITV श्रृंखला 1991 में शुरू हुई थी। 14 जिसका अर्थ है कि जदुरानी दासी का इंटरव्यू लगभग 1995 के आसपास हुआ था जैसा कि वीडियो में उनकी युवा उपस्थिति से स्पष्ट है। मुद्दा यह है कि ये साक्ष्य नए “खुलासो” से दशकों पहले के हैं।
इन वीडियो को गुप्त तिजोरियों में नहीं रखा गया था, बल्कि कई दशकों से लोगों की आखों के सामने प्रकाशित करके रखा गया है और हजारों लोगों ने इन्हें देखा है। लेकिन किसी तरह SAC को इसके बारे में पता नहीं चला। या, उन्हें पता था और उम्मीद थी कि दूसरे लोग भूल गए होंगे। या तो वे अपना होमवर्क करने में बहुत आलसी होंगे।
SAC ने अपना “उचित परिश्रम” क्यों नहीं किया? क्या ऐसा इसलिए था क्योंकि इससे उनकी थीसिस नकार दी जाती? पूर्व SAC सदस्य मुकुंद दत्त प्रभु व्यक्तिगत रूप से मुझसे कहते हैं—“यदि संक्षेप में कहें तो SAC इसी तरह काम करता है।”
मुकुंद दत्त प्रभु ने आगे कहा:
SAC के साथ मेरे अनुभव के बारे में एक बात यह है कि यह दर्शाता है कि SAC ने कितने समय तक खराब कार्यप्रणाली और भयावह एजेंडे को आश्रय दिया है। और ऐसे भ्रष्टाचार राजनीतिक विश्वासघातों में परिवर्तित हो गए, खासकर तब जब उर्मिला और उनके जैसे लोगों ने 2010 के बाद धीरे-धीरे SAC को अपने एजेंडे के समर्थकों से भर दिया। 2013 तक यह मेरे लिए बहुत स्पष्ट हो गया कि FDG मुद्दे पर इसका तथा-कथित “शोध” केवल एक पूर्व निर्धारित निष्कर्ष का पालन करता है। यह एक सामाजिक क्रान्तिकारी एजेंडा मात्र था जो उस समय के अनुकूल GBC_EC के सदस्यों — अनुत्तम प्रभु, तमोहर प्रभु और प्रघोष प्रभु — के द्वारा समर्थित था।15
SAC के आंतरिक कार्यकलाप के बारे में मुकुंद दत्त प्रभु से और जानने के लिये देखें: Politically Motivated Wrongdoings of the Sastric Advisory Committee.
गोविंद दासी इतिहासकार नहीं हैं
अगर SAC ने उचित शोध किया होता तो उन्हें पता चल जाता कि इस्कॉन के इतिहास के बारे में गोविंद दासी विश्वसनीय स्रोत नहीं है। जैसा कि जय अद्वैत स्वामी हमें बताते हैं:
मेरे दिल में मेरी वरिष्ठ गुरु-बहन गोविंद दासी के लिए बहुत ही कोमल जगह है। 1968 में, मेरे दीक्षा लेने के ठीक बाद, वह श्रील प्रभुपाद की रसोइया के रूप में सेवा कर रही थी, और बोस्टन में कुछ हफ्तों के लिए मुझे उनकी सहायता करने का मौका मिला। मैं हमेशा उन दिनों को याद रखूँगा जब मैं उनके और गौरसुंदर के साथ श्रील प्रभुपाद की सेवा में था। वह एक समर्पित शिष्या का एक बहुत अच्छा उदाहरण थी (और आज भी हैं)! लेकिन इतिहासकार गोविंद दासी के लिए, खैर. . . 16
इसके बाद उन्होंने दो लेखों में बताया कि गोविन्द दासी के ऐतिहासिक संस्मरण अविश्वसनीय क्यों हैं। ये लेख इस प्रकार है: “पुस्तक में परिवर्तन: इतिहास बी.बी.टी. का समर्थन करता है” 17 और “पुस्तक में परिवर्तन: इतिहास वास्तव में बी.बी.टी. का समर्थन करता है” 18
संक्षेप में कहे तो, ये दो लेख श्रील प्रभुपाद के कार्यों के बारे में BBT के संपादकीय निर्णयों को चुनौती देने के लिए गोविंद दासी की अपनी व्यक्तिगत संस्मरणों पर निर्भरता की आलोचना करते हैं। जयाद्वैत स्वामी का तर्क है कि गोविंद दासी की यादें अक्सर घटनाओं को गलत तरीके से प्रस्तुत करती हैं , खासकर भगवद-गीता पांडुलिपि तैयार करने और संपादन प्रक्रिया के संबंध में। लेख ऐतिहासिक सटीकता की आवश्यकता पर जोर देते हैं, प्रलेखित तथ्यों के साथ तुलना करने पर उनके दावों में विसंगतियों को देखते हैं। इन बिंदुओं पर जोर डाल कर BBT अपने परिशोधनों का बचाव करती है और इन परिवर्तनों को प्रभुपाद की शिक्षाओं के प्रति वफादार और उनके द्वारा अधिकृत के रूप में स्थापित करती है।
यह तर्क दिया जा सकता है कि जिस प्रकार गोविंद दासी ने पुस्तक संपादन का विरोध करते हुए, अपने रुख के अनुरूप अपनी यादों को “समायोजित” किया, उसी प्रकार, जब SAC ने USA में पहले ब्राह्मण-दीक्षा समारोह में उनके शोध और उनके अंतर्निहित उद्देश्यों के बारे में बताया (FDG और अन्य नारीवादी एजेंडों का समर्थन करना, जिसका वह भी समर्थन करती हैं) तो गोविंद दासी ने एक बार फिर अपने विवरण को “समायोजित” किया होगा। यह पैटर्न बताता है कि गोविंद दासी को अपने द्वारा समर्थित पदों को मजबूत करने हेतु कथाओं को तोड़ने-मरोड़ने के लिए जाना जाता है।
जो भी हो, हम गोविंद दासी की बदली हुई यादों को खारिज करते हैं और इसके बजाय ऐतिहासिक सटीकता के लिए ऊपर दिए गए अच्छी तरह से प्रलेखित पहले के साक्ष्यों पर भरोसा करते हैं। ये विवरण बोस्टन में ब्राह्मण-दीक्षा के दौरान गोविंद दासी के परेशान होने की घटना की लगातार परस्पर पुष्टि करते हैं।
SAC को इस्कॉन GBC की सबसे प्रतिष्ठित सलाहकार संस्था माना जाता है, फिर भी उन्होंने इतनी बड़ी गलती की। इससे निम्नलिखित संभावित परिदृश्य सामने आते हैं:
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यह कोई गलती नहीं थी, बल्कि धोखा देने के लिए सोची-समझी चाल थी। SAC ने गोविंद दासी के साथ सांठगांठ की और उसे अपनी कहानी बदलने के लिए प्रशिक्षित किया, इस उम्मीद में कि कोई इस पर ध्यान नहीं देगा।
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SAC ने गोविंद दासी की “परिवर्तित” स्मृति पर “आँखें मूंद ली” क्योंकि यह उनके राजनीतिक और वैचारिक उद्देश्यों के अनुकूल थी।
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SAC अक्षम है और उसके पास व्यवस्थित और गहन अनुसंधान करने की आधारभूत क्षमता ही नहीं है।
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उपरोक्त का कुछ संयोजन.
आइये अब हम अपना रुख बदलें और SAC के पाखंड पर प्रकाश डालें।
SAC का पाखंडपूर्ण दोहरा मापदंड
पृष्ठ 108 पर SAC कहता है:
यह सुझाव देना कि श्रील प्रभुपाद ने बोस्टन में महिलाओं को दीक्षा मंत्र इसलिए दिया क्योंकि उन्होंने ऐसा करने के लिए उन पर दबाव डाला था, अत्यधिक दुस्साहस पूर्ण है।
लेकिन, पृष्ठ 107 पर, वे ही यह (झूठा) दावा करते हैं,
गोविंद दासी कहती हैं कि उन्हें देरी इसलिए हुई क्योंकि वे इस बात से परेशान थीं कि कुछ भक्तों ने प्रभुपाद के बीमार होने के बावजूद भी उन पर दीक्षा देने का दबाव डाला था।
श्रील प्रभुपाद पर कथित दबावों को संबोधित करने में SAC की असंगतता चौंकाने वाली है। अपने पेपर के पेज 108 पर, वे इस धारणा को “अत्यधिक दुस्साहसी” बताते हैं कि श्रील प्रभुपाद ने महिलाओं के दबाव में आकर उन्हें गायत्री दीक्षा दी। लेकिन फिर पेज 107 पर, वे बिना किसी सवाल के इस दावे को आँखें मूंद कर स्वीकार करते हैं कि पुरुष शिष्यों ने श्रील प्रभुपाद के खराब स्वास्थ्य के बावजूद भी उन पर उनकी दीक्षा का समारोह आयोजित करने के लिए दबाव डाला।
SAC का यह दोहरा मापदंड, गवाहियों के प्रति उनके चयनात्मक दृष्टिकोण से स्पष्ट है। जब आरोप उनके नारीवादी एजेंडे से मेल खाते हैं, तो उन्हें विश्वसनीय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है; जब वे इसका खंडन करते हैं, तो उन्हें आपत्तिजनक या अटकलबाजी के रूप में खारिज कर दिया जाता है। इस तरह के चयनात्मक तर्क SAC जैसी महत्वपूर्ण संस्था से अपेक्षित निष्पक्षता को कमजोर करते हैं और इसके वैचारिक पूर्वाग्रह को उजागर करते हैं।
नारीवादी दुराग्रह का एक और उदाहरण
नारीवादी अहंकार का एक और उदाहरण यह दावा है कि पुरुषों ने श्रील प्रभुपाद पर महिलाओं को सुबह की सैर से बाहर रखने का दबाव डाला था। वास्तविक स्थिति परम पूज्य तमाल कृष्ण गोस्वामी समझाते हैं:
“एक और तरह से वे समान नहीं थे, वह यह कि कुछ समय बाद महिलाएं बहुत ही कम उनके साथ सैर पर जाती थी। अब महिलाएं दावा करती हैं कि यह संन्यासियों के कारण है। मुझे नहीं पता कि वे किस संन्यासी की बात कर रही हैं, लेकिन उनका कहना है कि कुछ संन्यासी वास्तव में महिलाओं को दूर कर रहे थे और उन्हें समान अधिकार नहीं देने दे रहे थे। इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है लेकिन प्रभुपाद ने इसकी अनुमति दी। प्रभुपाद इस तथ्य से इतने अनभिज्ञ नहीं थे कि सैर पर कोई महिला नहीं थी। वह कह सकते थे, “फलाँ-फलाँ कहाँ है, फलाँ-फलाँ कहाँ है?” और वह कहते भी थे, “फलाँ-फलाँ कहाँ है, फलाँ-फलाँ कहाँ है?” लेकिन वह “फलाँ-फलाँ” हमेशा संन्यासी या वरिष्ठ पुरुष ही होता था। इसलिए मुझे नहीं लगता कि प्रभुपाद सभी के लिए समान थे।
अब मैं आपको दिखाऊंगा कि कैसे वह सभी के लिए समान थे। क्योंकि जब आंदोलन की शुरुआत ही हुई थी, तब उन्होंने महिलाओं के लिए कहीं ज़्यादा समानता दिखाई, जब आंदोलन में कोई संन्यासी नहीं था। उनकी एक महिला सचिव थीं, गोविंद दासी। यह बहुत दिलचस्प है कि उन्होंने उससे कैसे छुटकारा पाया। बहुत दिलचस्प है, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि गोविंद दासी को एहसास हो कि वह सचिव को बदलना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने मुझे एक पत्र लिखवाया और मुझे पत्र लिखकर अलग से पोस्ट करने को कहा ताकि एक पुरुष सचिव को रखा जा सके। लेकिन उनकी पहली सचिव एक महिला थी। उनके लिए महिलाएँ खाना बनाती थी। और महिलाएँ भी पुरुषों की तरह ही उनके साथ चलती थीं। यमुना कीर्तन का नेतृत्व करती थीं। यमुना और हिमावती सार्वजनिक प्रवचन भी देती थीं।
लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे आंदोलन अधिक स्थापित होता गया, उन्होंने वह स्थापित करने का प्रयास किया जिसे आप “वैदिक संस्कृति” कह सकते हैं और यहीं से उन्होंने ये भेद करना शुरू किया। उनके मन में उन्होंने कोई भेद नहीं किया। 1977 में एक बार, प्रभुपाद ने मुझसे पूछा, “…कहाँ है,” मुझे लगता है कि यह उपेंद्र था, शायद। मैंने कहा, “वह रसोई में खाना बना रहा है।” तो प्रभुपाद ने कहा, “रसोई में और कौन है?” और मैंने कहा, “श्रुतिरूपा, अभिराम की पत्नी।” प्रभुपाद ने कहा, “ओह यह बहुत अच्छा नहीं है, कि वे एक साथ एक ही कमरे में हैं।” उन्होंने कहा, “मैं अब इन सभी चीजों से ऊपर हूँ। मैं एक बूढ़ा आदमी हूँ लेकिन आप सभी युवा संन्यासी हैं, आपको बहुत सावधान रहना चाहिए।” इसलिए उन्होंने संन्यास आश्रम की रक्षा के लिए और सामान्य रूप से वैदिक शिष्टाचार को बनाए रखने के लिए ये चीजें कीं।”
24 अगस्त 2000 को हंगरी में भाषण
यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि उपेंद्र प्रभु संन्यासी नहीं थे। और, श्रुतकीर्ति प्रभु ने अपनी पुस्तक 19 में बताया है कि श्रील प्रभुपाद ने उन्हें आध्यात्मिक पतन से बचने के लिए महिलाओं के साथ एक ही रसोई में खाना न पकाने की सलाह दी थी। तो यह केवल संन्यासियों की रक्षा के बारे में नहीं था , बल्कि दोनों लिंगों के आध्यात्मिक जीवन की रक्षा के बारे में था। हालांकि, श्रील प्रभुपाद संन्यासियों के लिए विशेष रूप से सुरक्षात्मक थे क्योंकि वर्णाश्रम धर्म समाज में आध्यात्मिक गुरु के रूप में संन्यासियों की विशेष स्थिति थी।
इस्कॉन में कुछ महिलाओं का व्यवहार ऐसा था कि संन्यासियों को पतन का सामना करना पड़ा
कृष्ण की वैदिक संस्कृति में, ब्रह्मचारी और विशेष रूप से संन्यासियों को अमूल्य रत्न माना जाता है, जिनके ब्रह्मचर्य की शुद्धता सुनिश्चित एवं सुरक्षित करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, पुरुषों को पारंपरिक रूप से प्रशिक्षित किया जाता है कि वे संन्यासी को कभी भी किसी महिला के साथ अकेला न छोड़ें, और पवित्र महिलाओं को ऐसे तरीकों से काम करने से बचना सिखाया जाता था जो संन्यासियों को आकर्षित करें, लुभाये या परेशान करें। सामान्य तौर पर समाज में पवित्र माहौल बनाए रखने के लिए स्त्री-पुरुष को सख्ती से अलग रखा जाता था। लेकिन, निम्नलिखित वार्तालाप में, श्रील प्रभुपाद ने इस्कॉन के भीतर एक परेशान करने वाले विचलन पर प्रकाश डाला — कुछ पतिहीन महिलाएं जानबूझकर पुरुषों का ध्यान आकर्षित करने के लिए आकर्षक कपड़े पहन रही थीं, ताकि उनको पति के रूप में फंसा सकें। यहां तक कि वे संन्यासियों को भी ललचाती थीं, जिसके कारण आध्यात्मिक पतन के किस्से सामने आए .
प्रभुपाद: एक बात यह है कि इस तरह का प्रचार, और यह, यह पोशाक, बहुत अच्छी है। जिन लड़कियों के पति नहीं हैं, उन्हें इस तरह के कपड़े पहनने चाहिए, आकर्षक पोशाक नहीं। पोशाक कभी-कभी विपरीत लिंग को आकर्षित करती है। और महिलाएँ…, स्वभाव से वे बहुत अच्छे कपड़े पहनती हैं। [हँसते हुए] यह हर जगह होता है – आकर्षित करने के लिए। सच यह है कि वे स्वभाव से आश्रित हैं, महिलाएँ। आप मानते हैं या नहीं?
पालिका: हाँ. …
जगदीशा: अधिकांश महिलाओं, या कम से कम हमारे समाज की बहुत सी महिलाओं के न तो पिता हैं, न पति, न ही बेटा।
प्रभुपाद: यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है। इसलिए हम उन सभी को यह देना चाहते हैं, “आओ और रहो।” लेकिन जब तुम यहाँ आओ, अगर तुम्हें पति मिल जाए तो हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन ललचाओ मत।यह अच्छा नहीं है। और यह हमारे संन्यासियों का पतन करा रहा है। बेशक, यह मुश्किल है कि युवा पुरुष, युवा महिलाएँ एक साथ रह रहें हो, आपस में घुलमिल रहे हो और….। इस तरह का पाखंड – उन्होंने संन्यास ले लिया है और महिलाओं के साथ घुलमिल रहे हैं – इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
वार्तालाप — 7 जनवरी, 1977, मुंबई
” रात्रि में डाकुओं ने श्रीमती राधारानी को चुरा लिया”20 यह प्रबन्ध दर्शाता है कि क्यों श्रील प्रभुपाद चाहते थे कि हम स्त्री-पुरुष को अलग करने के वैदिक सामाजिक शिष्टाचार को बनाए रखें और इसकी उपेक्षा करने से होने वाले गंभीर परिणाम भी दर्शाता है।
इस्कॉन के भीतर के नारीवादियों ने इतिहास को फिर से लिखा है श्रील प्रभुपाद के कार्यों और शिक्षाओं को नारीवादी दृष्टिकोण में फिट करने के लिए उनकी पुनर्व्याख्या करके। वे सुझाव देते हैं कि प्रभुपाद महिलाओं की समस्याओं के बारे में जानते थे और उनके प्रति सहानुभूति रखते थे, किन्तु नए दीक्षा प्राप्त पुरुष ब्रह्मचारियों की चिंताओं को समायोजित करने के लिए दबाव में आकर उन्होंने रूढ़िवादी सख्त स्त्री-पुरुष-भूमिकाओं को अनुमति दी। वास्तव में श्रील प्रभुपाद ने नए दीक्षा प्राप्त पुरुष ब्रह्मचारियों (और अपने सभी शिष्यों के आध्यात्मिक स्वास्थ्य) के बारे में अपनी चिंताओं के कारण सख्त स्त्री-पुरुष भूमिकाओं को लागू किया। यह बदलाव-वादी दृष्टिकोण प्रभुपाद को उनके द्वारा प्रचारित उन पारंपरिक स्त्री-पुरुष भूमिकाओं से दूर करना चाहता है जिनका आधार वैदिक शास्त्र और शिष्टाचार है, और वास्तव में प्रभुपाद द्वारा वांछित इन भूमिकाओं को लागू करने के लिए पुरुष नेताओं पर दोष मढ़ना चाहता है। नारीवादियों ने ऐतिहासिक विवरण को बदल कर हमारे समाज में एक स्त्री-पुरुष के बीच में फ़ूट डाली है, जैसाकि वर्तमान धर्मनिरपेक्ष समाज में भी ये नारीवादियाँ करती हैं। अपने इस लैंगिक-समानता के विचार को समर्थन देने हेतु उन्होंने श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं का गलत तरीके से अर्थघटन किया है। नारीवादियों की वास्तविक समस्या श्रील प्रभुपाद की कुछ शिक्षाओं से है, जिनसे वे हृदय से सहमत नहीं हैं और जिन्हें वे स्वीकार नहीं करना चाहती। 21
स्त्री-पुरुष भूमिकाओं का पृथक्करण वर्णाश्रम धर्म का मूल है, जिसे श्रील प्रभुपाद ने अपने शिष्यों की नैतिक कमियों के कारण स्थापित करने का प्रयास किया था। 22 किन्तु बिना वर्णों का वर्णाश्रम किसी भी मापदंड से वर्णाश्रम नहीं है। 23 उसी प्रकार पुरुषों और महिलाओं के बीच भेद किए बिना भी कोई वर्णाश्रम नहीं हो सकता। वर्णाश्रम को लागू करने के श्रील प्रभुपाद के निर्देश को अनदेखा करने के कारण कई प्रमुख नेताओं का पतन हुआ और तत्पश्चात् “ऋत्विक” नामक पाषंड का उदय हुआ।
विषय पर वापस लौटते हुए: SAC के तर्क के अनुसार, जब नारीवादी झूठा दावा करते हैं कि श्रील प्रभुपाद पर पुरुषों द्वारा दबाव डाला गया था, तो इसे उचित माना जाता है। लेकिन, जब अन्य लोग तथ्यात्मक रूप से कहते हैं कि श्रील प्रभुपाद पर महिलाओं द्वारा दबाव डाला गया था, तो इसे “अत्यधिक दुस्साहस पूर्ण” कहकर खारिज कर दिया जाता है। हम ऐसे SAC के तर्क को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं।
इस्कॉन में विद्रोही महिलाओं के उदाहरण
माधवी-लता दासी ने विद्रोह किया था .
हमने पहले माधवी लता दासी का ज़िक्र किया था, जो एक कलाकार और जदुरानी दासी की सहयोगी थीं। वह एक अशांत मन के लिए विख्यात हैं। श्रील प्रभुपाद ने उनका वर्णन इस प्रकार किया है , “यह लड़की बहुत परेशान करने वाली लगती है और वह जहां भी जाती है वहां कुछ न कुछ परेशानी ही नज़र आती है।” 24 उसे चोरी के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था और जेल भी भेजा गया था।25
माधवी लता दासी ने किसी भी प्रकार की रोक-टोक के प्रति एक विद्रोही रवैया प्रदर्शित किया था। उन्होंने महिलाओं द्वारा ब्रह्म-गायत्री प्राप्त करने पर प्रतिबंध को चुनौती दी, जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, और इस रुख में वह अकेली नहीं थीं। इस चुनौती को कृष्ण की वैदिक संस्कृति में स्त्रियों पर लगाई गई सीमाओं के खिलाफ कुछ नारीवादी महिलाओं द्वारा व्यापक विद्रोह के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। निम्नलिखित प्रतिलेख में, श्रील प्रभुपाद विशेष रूप से माधवी लता दासी के विद्रोही और अड़ियल स्वभाव पर प्रकाश डालते है:
प्रभुपाद: संपूर्ण वैदिक सभ्यता का उद्देश्य मनुष्य की सभी बुरी आदतों को सीमाबद्ध कर शून्य तक पहुँचा करके उसे पारलौकिक स्तर पर लाना है। लेकिन अचानक नहीं। धीरे-धीरे, गुणवत्ता के अनुसार। इसी तरह, जो लोग मांस खाने के आदी हैं, मांसाहार: “ठीक है।” वैदिक साहित्य कहता है, “ठीक है। आप मांस खा सकते हैं। लेकिन देवी काली के सामने एक जानवर की बलि दें, और आप खा सकते हैं।” ताकि जो आदमी मांस खा रहा है, वह विद्रोह न करे। अगर मैं कहूँ… जैसे कई पुरुष पहले से ही विद्रोह कर रहे हैं। वह लड़की? क्या नाम है?
भक्त: माधवी-लता.
प्रभुपाद: माधवी-लता, उसने विद्रोह किया। उसने विद्रोह किया. वह हमेशा यह दलील देने की कोशिश करती थी, “यह प्रतिबंध क्यों? यह प्रतिबंध क्यों?” इसलिए मुझे कहना पड़ा, “यदि आपको प्रतिबंध पसंद नहीं है, तो चले जाइए। आप हमारे साथ संबंध न रखें।” क्या किया जा सकता है? वे प्रतिबंध नहीं चाहते हैं। यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है। लेकिन ये शास्त्र प्रतिबंध के लिए हैं। जैसे विवाह यौन जीवन का प्रतिबंध है। और देवी काली के सामने बलि चढ़ाना, यह भी मांसाहार का प्रतिबंध है। आप बूचड़खाने से मांस खरीद कर नहीं खा सकते। … इसलिए ये पुस्तकें हैं, ये साहित्य हैं। मेरा मतलब है, वैदिक साहित्य हमारे जीवन को प्रतिबंधित करने और हमें ऊपर उठाने के लिए हैं।
श्रीमद्भागवतम् 1.5.9-11 — 6 जून, 1969, New Vrindavan
माधवी लता दासी अवश्य ही कुख्यात रही होंगी, क्योंकि हम देखते हैं कि भक्त तुरंत जानते थे कि श्रील प्रभुपाद किसकी ओर संकेत कर रहे हैं।
गोविंद दासी ने अपने गुरु की शिक्षा को अस्वीकार कर दिया
श्रील प्रभुपाद की प्रारंभिक पश्चिमी महिला शिष्यों की विद्रोही प्रकृति के संबंध में, निम्नलिखित प्रसंग से पता चलता है कि कैसे इस्कॉन में श्रील प्रभुपाद द्वारा अनुमत कुछ प्रथाएं वास्तव में उनके द्वारा वांछित नहीं थीं।
Text PAMHO:2441074 (31 lines)
From: Kusha (dd) ACBSP (Philadelphia, PA – USA)
Date: 01-Jul-99 12:37 (08:37 -0400)
To: (Arcana) Deity Worship [3442]
Subject: Re: babies moochi
————————————————————प्रिय उर्मिला प्रभु,
दंडवत! जय श्रील प्रभुपाद!
गौरसुंदर और गोविंद दासी, पति और पत्नी की टीम श्रील प्रभुपाद की 1967-68 की सेविका और सचिव थीं। कृष्णकृपामूर्ती (प्रभुपाद) ने गोविंद दासी से अनुरोध किया कि वह अपने मासिक धर्म के प्रथम दिन से ही अपने कर्तव्यों से तीन दिन का अवकाश ले लें। उसने इस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त की जैसे कि उसने अपने गुरु महाराज के निर्देश को अस्वीकार कर दिया हो क्योंकि वह उनकी व्यक्तिगत सेवा या उपस्थिति को छोड़ना नहीं चाहती थी। गोविंद दासी SP के अनुरोध के आगे समर्पण नहीं करना चाहती थी, इसलिए कृष्णकृपामूर्ती (प्रभुपाद) ने कहा, “ओह, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
एक अन्य अवसर पर, गोविंद दासी श्रील प्रभुपाद की धोती को एक विशेष पत्थर से भगवा रंग में रंग रही थीं। श्रील प्रभुपाद ने फर्श पर कुछ लाल रंग का तरल पदार्थ देखा और गोविंद (दासी) से पूछा कि क्या मासिक धर्म इसका कारण है। यदि ऐसा है तो गोविंद दासी को अपनी नियमित सेवा से विरत रहना चाहिए और तीन दिन की छुट्टी ले लेनी चाहिए। गोविंद दासी ने बताया कि फर्श पर धब्बे धोती से रंग के रिसाव के कारण थे, जब वह उसे सुखाने के लिए ले जा रही थी।
इस घटना के कई सालों बाद कई सालों तक गोविंद दासी ने श्रील प्रभुपाद के आदेश का पालन किया। उन्हें श्रील प्रभुपाद के निर्देश का महत्व समझ में आया और इस विशेष निर्देश को शुरू में अस्वीकार करने के बावजूद वे धीरे-धीरे पालन करने के लिए तैयार हो गई।
श्रील प्रभुपाद चाहते थे कि महिलाओं को सभी प्रकार की विग्रह-सेवा से 3 दिन की छुट्टी लेनी चाहिए। इसमें खाना बनाना और सिलाई करना शामिल है। शुरुआती विद्रोह और जानकारी की कमी के कारण यह तथ्य व्यापक रूप से ज्ञात नहीं है। मुझे उम्मीद है कि यह प्रसंग इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डालता है कि हमें अपने प्रिय इस्कॉन की स्थापना के आरंभ में श्रील प्रभुपाद द्वारा बताए गए 3 दिन की छुट्टी के नियम का पालन करना चाहिए। भारत वर्ष में, सनातन धर्म के अनुयायी वैदिक निर्देश के अनुसार इस नियम का सम्मान पूर्वक पालन करते हैं।
आपकी सेविका, कुशा देवी दासी
(PAMHO:2441074)
गोविंद दासी के एक मित्र ने मुझे इस प्रसंग के संबंध में निजी तौर पर लिखा था:
गोविंद दासी ने मुझे कई बार बताया है कि उन्हें इस घटना के बारे में कुछ अपराधबोध महसूस होता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि श्रील प्रभुपाद ने उसके मन के कारण अपने आदर्श से समझौता किया—मन जिसने उनके निर्देश को अस्वीकार कर दिया था। उन्हें यह भी लगा कि इससे “स यत प्रमाणं कुरुते” का प्रसंग भी बन गया जिससे एक निम्न मानक की स्थापना हो गई जिसे वह रोक सकती थी।
श्रील प्रभुपाद चाहते थे कि वह उनकी बात माने, लेकिन जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो उन्होंने सहजता से कहा, “ओह, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता,” हालांकि इसका महत्व निर्विवाद था। इसी तरह गायत्री-मंत्र के संबंध में उन्होंने चतुराई से कहा, “उन्हें इसे देने में कोई नुक्सान नहीं दिखता”। विद्रोही व्यक्तियों के सामने होने पर विकल्प सीमित होते हैं। महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री देना, जो शास्त्र द्वारा निषिद्ध है, एक और निम्न मानक की स्थापना है जिसमें गोविंद दासी शामिल थी।
“G” और ब्रह्मानन्द प्रभुओं को पत्र
और, G प्रभु के पास उनके विवाह के बारे में एक पत्र भी है, जिसमें श्रील प्रभुपाद ने कहा कि पश्चिमी लड़कियाँ (उनकी शिष्याएँ), “अब अपने पतियों के प्रति बहुत अधिक विनम्र और आज्ञाकारी नहीं रहीं।”26
लेकिन जो व्यक्ति मन से अशांत है, उसे विवाह अवश्य करना चाहिए। इसलिए, उसे स्वयं ही यह निर्णय लेना चाहिए कि उसे विवाह करना चाहिए या नहीं। हालांकि यह एक तथ्य है कि यदि कोई व्यक्ति कृष्ण की सेवा में पूरी तरह से लगा हुआ है, तो यह कामवासना बहुत अधिक परेशान नहीं करती है। लेकिन आपको बाहर कर्मियों और विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ काम करना होगा। ऐसी परिस्थिति में यदि आपकी मदद करने के लिए एक अच्छी पत्नी है, तो यह बहुत अच्छा होगा। एक और कठिनाई यह है कि आधुनिक सभ्यता में हर कोई स्वतंत्र भावना वाला है। लड़कियाँ अब अपने पतियों के प्रति बहुत विनम्र और आज्ञाकारी नहीं रही हैं। इसलिए आपको अपनी भावी पत्नी की ऐसी सनक को सहन करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमारी वैदिक सभ्यता के अनुसार, पति और पत्नी के बीच मतभेद को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है। लेकिन आधुनिक युग में पति या पत्नी द्वारा तलाक की भी अनुमति दी जाती है। ये चीजें अच्छी नहीं हैं। लेकिन शादी के बाद, निश्चित रूप से पति और पत्नी के बीच कुछ मतभेद या गलतफहमी होगी।
पत्र: G- लंदन, 26 नवम्बर, 1969
और, वास्तव में, G की पत्नी वैसी ही निकली जैसा कि श्रील प्रभुपाद ने बताया था, जिसके कारण विवाह टूट गया। ब्रह्मानन्द प्रभु को भी ऐसा ही एक पत्र लिखा गया था:
मुझे भी लगता है कि गर्गमुनि को भी दूसरी पत्नी मिलनी चाहिए। क्योंकि स्त्री की संगति के बिना कर्मी काम नहीं कर सकते। इसलिए चूंकि वह कर्मी बनने जा रहा है—बिल्कुल कर्मी नहीं, कर्म-योगी—इसलिए अगर वह चाहे तो दोबारा शादी कर सकता है। लेकिन वह बहुत सख्त पति नहीं हो सकता, अन्यथा वही होगा। क्योंकि अमेरिका में लड़कियों को इतना प्रशिक्षित नहीं किया जाता कि वे बहुत आज्ञाकारी हों। इसलिए आप सोचिए, लेकिन अगर वह चाहे, तो दोबारा शादी कर सकता है।
ब्रह्मानंद को पत्र, सिएटल, 16 अक्टूबर 1968
सुनीता की कहानी
उर्मिला दासी के साथ मेरा यह ईमेल आदान-प्रदान संक्षिप्त है, जिसमें केवल वही हिस्सा है जो हमारी कथा के लिए आवश्यक है। यह दर्शाता है कि कैसे श्रील प्रभुपाद की पश्चिमी महिला शिष्याओं ने सक्रिय रूप से एक अन्य महिला शिष्या को प्रभुपाद के निर्देशों का उल्लंघन करने के लिए मजबूर किया:
Letter PAMHO:9465359 (283 lines)
From: Shyamasundara (das) ACBSP (Vedic Astrologer) (USA)
Date: 21-Feb-05 04:19 -0500
To: Urmila (dd) ACBSP (ISKCON School NC – USA)
Reference: Text PAMHO:8694516 by Urmila (dd) ACBSP
Comment: Text PAMHO:9467158 by Urmila (dd) ACBSP
Subject: Re: पत्नियों का रहस्यमय जीवन + “यह कोई पुस्तक का विवेचन नहीं”
————————————————————प्रिय माता उर्मिला,
कृपया मेरे विनम्र प्रणाम स्वीकार करें। श्रील प्रभुपाद की जय हो।
मुझे खेद है कि मैंने पहले जवाब नहीं दिया। मैं असाधारण रूप से व्यस्त था और फिर 3 तूफान हमारे ऊपर टूट पड़े और फिर मैं बीमार हो गया। मैं इस अवसर पर आपके दूसरे पत्र का भी उत्तर दूंगा।
## विषय संबंधी अंश ##
दिवंगत सुनीता देवी दासी को याद करें? आखिरी बार जब मैंने उन्हें जीवित देखा था, मई 1996 में, उन्होंने मुझे एक कहानी सुनाई थी। तब तक मुझे नहीं पता था कि X से पहले उनकी शादी किसी और से हुई थी। क्या आपको पता था? वैसे भी उन्होंने मुझे बताया कि उनकी शादी एक मारवाड़ी व्यक्ति से हुई थी जो भक्त नहीं था। वह 4 नियमों का पालन नहीं करता था। उन्होंने मुझे बताया कि वह श्रील प्रभुपाद के पास गई और उनसे पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए? श्रील प्रभुपाद ने उनसे कहा: “बस वही करो जो तुम्हारी माँ ने तुम्हें करने के लिए सिखाया है; अपने पति की अच्छी तरह से सेवा करो (और इसे कृष्ण को अर्पित करो )।” लेकिन जब वह मंदिर वापस गई तो उसकी पश्चिमी गुरु-बहनें, जो सभी सांस्कृतिक रूप से बर्बर थी, उसे अपने पति को तलाक देने के लिए आग्रह करती रहीं और कहा कि “वह एक राक्षस है।” अंततः वह मान गई और उसने अपने पति को तलाक दे दिया और बाद में X से विवाह कर लिया। आखिरी बात जो उसने मुझसे कही वह थी: “आज तक मुझे श्रील प्रभुपाद की अवज्ञा करने का पछतावा है।”
## विषय संबंधी अंश समाप्त ##
आपका विनम्र सेवक, श्यामसुंदर दास
(Text PAMHO:9465359)
Letter PAMHO:9467158 (73 lines)
From: Urmila (dd) ACBSP (ISKCON School NC – USA)
Date: 21-Feb-05 10:52 -0500
To: Shyamasundara (das) ACBSP (Vedic Astrologer) (USA) [28497]
Reference: Text PAMHO:9465359 by Shyamasundara (das) ACBSP
Comment: Text PAMHO:9908051 by Shyamasundara (das) ACBSP
Subject: प्रत्युत्तर
————————————————————कृपया मेरा प्रणाम स्वीकार करें। श्रील प्रभुपाद की जय हो!
आपके लंबे और सावधानीपूर्वक लिखे गए पत्र के लिए तथा समय निकालने के लिए धन्यवाद।
कृपया, अपनी इच्छा से, मेरे चार्ट को देखें और मुझे अच्छी सलाह दें।
मैं बहुत आभारी हूँ.
## विषय संबंधी अंश ##
आपकी दासी,उर्मिला देवी दासी
PS. सुनीता के बारे में मुझे हमेशा से यह बात पता थी। उन दिनों हम लोग बहुत ही मूर्ख, कट्टर रूप से गुमराह लोग थे।
(TEXT PAMHO:9467158)
उर्मिला दासी ने एक दिलचस्प टिप्पणी की। “मूर्ख, कट्टर रूप से गुमराह” से उनका क्या मतलब था? सुनीता दासी ने श्रील प्रभुपाद के निर्देशों को अपनी पश्चिमी गुरु-बहनों को बताया था, फिर भी उन सभी ने (ऐसा लगता है कि उर्मिला दासी सहित) सुनीता को उन्हें अनदेखा करने के लिए प्रोत्साहित किया। शायद यह नारीवादी अवज्ञा की एक कट्टर अभिव्यक्ति को दर्शाता है जो अपने पति की सेवा करने के विचार को, नारीवादी बयानबाजी में, “एक आदमी का गुलाम होना” के रूप में खारिज कर देती है। या तो फ़िर उन्हें विश्वास हो सकता है कि वे श्रील प्रभुपाद से बेहतर जानती थीं। उनके इरादे चाहे जो भी हों, उनके कार्य निश्चित रूप से सुनीता को श्रील प्रभुपाद के निर्देशों का पालन करने में मदद करने के लिए “कट्टरपंथी” नहीं थे, बल्कि उन्हें उनका उल्लंघन करने के लिए प्रेरित किये थे। यह था पश्चिमी महिला शिष्यों द्वारा श्रील प्रभुपाद की व्यक्त इच्छाओं का विरोध करने का एक और उदाहरण।
“न ही महिलाएं मां की तरह व्यवहार करती हैं”
भूरीजन प्रभु की पुस्तक “माई ग्लोरियस मास्टर” (पृष्ठ 341) से यह उद्धरन स्वयं ही स्पष्ट है:
चंद्रावली: प्रभुपाद, हम सुनते हैं कि हमारे दर्शन में पुरुषों को महिलाओं के साथ माता जैसा व्यवहार करना चाहिए। लेकिन असल में, पुरुष, खास तौर पर संन्यासी, महिलाओं के साथ माता जैसा व्यवहार नहीं करते। इसके बजाय वे उन्हें माया मानते हैं। महिलाएँ नहीं किन्तु उनका ऐसा रवैया माया लगता है! यह उचित नहीं लगता।
प्रभुपाद ने उसकी शिकायत ध्यान से सुनी। वे धीरे से मुस्कुराए और जवाब देने लगे। उनके मुँह से शब्द ऐसे निकले जैसे वे पेड़ से मीठे पके फल गिर रहे हों।
प्रभुपाद: हाँ, पुरुष महिलाओं के साथ माँ जैसा व्यवहार नहीं करते। न ही महिलाएँ माँ जैसा व्यवहार करती हैं। न ही वे माँ जैसा वस्त्र पहनती हैं। 27
इस्कॉन में महिलाएं भी अनर्थ से मुक्त नहीं हैं
आज श्रील प्रभुपाद की कई महिला शिष्याएँ खुद को आत्म-प्रशंसनीय शब्दों में वर्णित करना पसंद करती हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने योजनाबद्ध रूप से “महिला मंत्रालय” का नाम बदलकर “वैष्णवी मंत्रालय” कर दिया, लेकिन “महिला मंत्रालय” ही वह मूल नाम था जिसे उन्होंने ही तो चुना था। वे विरोध करती हैं कि यह “FDG” (स्त्री-दीक्षा-गुरु) नहीं बल्कि “VDG” है (वैष्णवी दीक्षा गुरु) लेकिन ऐतिहासिक रूप से इस्कॉन में “महिला दीक्षा-गुरु” नाम तो उनकी ओर से ही आया था और यह नाम SAC के 2005 के FDG समर्थक पेपर का शीर्षक था।
नाम बदलकर “वैष्णवी” कर देने से अपने आप में कोई दिव्यता या “उच्च स्तर का दर्जा” नहीं आ जाता, अर्थात “भाव” और “प्रेम” की प्राप्ति नहीं हो जाती। इस्कॉन में भगवान कृष्ण की सेवा करने की इच्छा रखने वाली महिलाएँ अनर्थ से मुक्त या आलोचना से मुक्त नहीं हैं।
धर्म-संकट
“धर्म- संकट” शब्द का अनुवाद “नैतिक दुविधा” या “नैतिक संकट” के रूप में किया जा सकता है। “धर्म” का अर्थ कर्तव्य, धार्मिकता या नैतिक कानून है, जबकि “संकट” का अर्थ कठिनाई या संकट है। तो पूरा शब्द, धर्मसंकट एक ऐसी स्थिति का वर्णन करता है जहाँ व्यक्ति को परस्पर विरोधी कर्तव्यों या नैतिक सिद्धांतों से जुड़ी चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना करके निर्णय लेना पड़ता है। शास्त्र धर्मसंकट के उदाहरणों से भरे पड़े हैं — भगवद गीता में , कृष्ण अर्जुन को अपने रिश्तेदारों से लड़ने या न लड़ने की नैतिक दुविधा का समाधान दे रहे हैं। पिछले फ़ुटनोट में हमने दुर्वासा मुनि के संबंध में अम्बरीष महाराज के धर्मसंकट का उल्लेख किया था।
सबसे नाटकीय मामलों में से एक वह दुविधा है जिसका सामना वसुदेव ने किया जब कंस अपनी पत्नी देवकी की हत्या करने जा रहा था। 28 देवकी को बचाने के लिए, वसुदेव अपने सभी अजन्मे बच्चों को कंस को मारने के लिए देने को सहमत हुए। क्योंकि ऋषियों ने कहा है आपत्-काले नास्ति मर्यादा – “संकट के समय, कोई सीमा नहीं होती।” इसका तात्पर्य है कि महत्वपूर्ण या आपातकालीन स्थितियों के दौरान, सामान्य नियम या मानदंड को विराम दिया जा सकता हैं। 29 और जैसा कि नीति-शास्त्र 30 हमें बताता है, “एक परिवार को बचाने के लिए एक सदस्य की बलि दी जा सकती है, एक गाँव को बचाने के लिए एक परिवार की बलि दी जा सकती है, एक देश को बचाने के लिए एक गाँव की बलि दी जा सकती है, और किसी की आत्मा को बचाने के लिए सब कुछ बलिदान किया जा सकता है।” 31 इसलिए अपने परिवार (देवकी) को बचाने के लिए वसुदेव ने अपने अजन्मे बच्चों की बलि देदी। वैष्णव टीकाकारों का मानना है कि वसुदेव द्वारा अपने भावी पुत्रों को कंस को देने का वचन धार्मिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। किन्तु, देवकी की आसन्न मृत्यु को रोकने के लिए, उन्हें ऐसा वचन देने के लिए बाध्य होना पड़ा। उन्होंने भविष्य को भाग्य पर छोड़ दिया, और हालाँकि उनके कार्य धर्म के विपरीत प्रतीत होते थे, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए वे दोषी नहीं थे।
श्रील प्रभुपाद का धर्म-संकट से सामना
1968 में यूएसए में प्रथम ब्राह्मण-दीक्षा के समय श्रील प्रभुपाद अपनी महिला शिष्यों को ब्रह्मगायत्री नहीं देना चाहते थे क्योंकि शास्त्र 32 में इसकी मनाही है, क्योंकि उनके गुरु ने अपनी महिला शिष्यों को ब्रह्मगायत्री नहीं दी, और क्योंकि किसी भी पिछले प्रामाणिक वैष्णवाचार्य ने ऐसा नहीं किया , न ही किसी रूढ़िवादी संप्रदाय या वैदिक संस्कृति के अन्य पारंपरिक अनुयायी ने ऐसा किया था। यह सख्ती से वर्जित है। तो उन्होंने अपना विचार क्यों बदला और कुछ ऐसा क्यों किया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था — महिलाओं को ब्रह्मगायत्री देना? आइए हम उनकी अनूठी परिस्थितियों पर विचार करें जिसने उनके धर्म-संकट का गठन किया।
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कृष्ण की वैदिक संस्कृति स्त्रियों को ब्रह्मगायत्री देने से मना करती है।
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ब्राह्मण और ब्राह्मण परिवारों में स्त्रियाँ इस मंत्र का जाप नहीं करतीं।
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प्रभुपाद ब्रह्मगायत्री नहीं देना चाहते थे।
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वह हिप्पियों ( यवनों और म्लेच्छों ) को उपदेश दे रहे थे जिनके सामाजिक रीति-रिवाज बहुत भिन्न थे, और जिन्हें अचानक नहीं बदला जा सकता था।
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विशेषकर कुछ महिलाएं नारीवाद से प्रभावित थीं और विद्रोही थीं।
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उन्हें कृष्ण की वैदिक संस्कृति के मानकों या अपेक्षाओं की लगभग कोई समझ नहीं थी।
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स्त्री-धर्म उनके लिए एक अज्ञात अवधारणा थी।
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उनका प्रचार मिशन, इस्कॉन, अपनी प्रारंभिक अवस्था और नाजुक स्थिति में था।
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उनकी कुछ प्रमुख महिला शिष्याएँ बहुत परेशान हो गईं और उन्होंने “नारीवादी विरोध” किया।
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पुरुषों और महिलाओं के बीच पड़ी इस फ़ूट से आंदोलन का दम घुट सकता था।
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उनके पास परामर्श के लिए अन्य कोई नहीं था, क्योंकि किसी भी वैदिक व्यक्ति या परिषद् को कभी भी स्वच्छन्द म्लेच्छों और नारीवादियों 33 को उपदेश देने की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा था।
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उन्हें तुरन्त ही निर्णय लेकर इस्कॉन की एकजुटता बनाए रखने के लिए कार्य करना था।
वैदिक संस्कृति का पालन करने में अपनी महिला शिष्यों की असमर्थता को देखते हुए उन्होंने इस तरह से कार्य किया कि एक नवजात इस्कॉन को संभावित नुकसान से बचाया जा सके और अपनी विद्रोही महिला शिष्यों की भावनाओं को शांत किया जा सके। इस प्रकार उन्होंने एक अस्थायी उपाय के रूप में उन्हें ब्रह्म-गायत्री देने का फैसला किया, लेकिन धागा नहीं दिया और इस तरह अपनी दुविधा को हल किया। क्योंकि पंचतंत्र 34 (4.28-29) हमें बताता है:
जब सबकुछ लूटनेवाला हो, तो बुद्धिमान व्यक्ति स्वेच्छा से आधा हिस्सा दे देता है और बाकी से काम करता है, क्योंकि पूरा नुकसान असहनीय होता है। बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी छोटे हितों के लिए बड़े हितों का त्याग नहीं करता। यही असली समझदारी है।
इससे पता चलता है कि कठिन समय में, बुद्धिमान लोग जीवित रहने या क्षति को कम करने के लिए, जो कुछ उनके पास है उसका कुछ हिस्सा देने को तैयार रहते हैं।
हालाँकि वे गंभीर थे, फिर भी श्रील प्रभुपाद की महिला शिष्यों की अक्षमता के कारण उन्हें तत्कालिक उपाय अपनाने पड़े ताकि आत्माओं को कृष्णभावनामृत की ओर लाने की सर्वोत्तम और सबसे आवश्यक क्रिया को बनाए रखा जा सके।
“मुझे कभी-कभी कुछ ऐसा करना पड़ता था जो मुझे नहीं करना चाहिए था”
श्रील प्रभुपाद स्वयं हमें बताते हैं कि कभी-कभी उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता था, सिवाय उन कार्यों के जो उन्हें नहीं करने चाहिए थे:
प्रभुपाद: पश्चिमी देशों में, मुझे कभी-कभी कुछ ऐसा करना पड़ता था जो मुझे नहीं करना चाहिए था। लेकिन मैंने बहुत सी आत्माओं को कृष्ण के पास लाने के लिए ऐसा किया है।
ब्रह्मानन्द: प्रचार के लिए यह आवश्यक है।
प्रभुपाद: हाँ। क्योंकि अगर कोई दूसरा विकल्प नहीं है, तो मैं क्या कर सकता हूँ?
सुबह की सैर – 9 मार्च, 1974, मायापुर
और, शुरुआत में उन्होंने वही किया जो मिशन शुरू करने के लिए आवश्यक था। लेकिन अब हमें अधिक सावधान रहना चाहिए।
प्रभुपाद: वे सभी आदर्श आचार्य जैसे होने चाहिए। शुरुआत में हमने काम करने के लिए ऐसा किया है। अब हमें बहुत सावधान रहना चाहिए। जो कोई भी भ्रष्ट हो रहा है, उसे बदला जा सकता है।
GBC की श्रील प्रभुपाद से मुलाकात – 28 मई, 1977, वृंदावन
इतिहास को झुठलाने के दुष्परिणाम
हमने यह प्रदर्शित किया है कि SAC ने श्रील प्रभुपाद द्वारा पहली बार अमेरिका में अपने शिष्यों को गायत्री दीक्षा दिए जाने के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है। इसके क्या परिणाम होंगे?
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने आध्यात्मिक साधना में कुछ महत्वपूर्ण नवीनताएँ प्रस्तुत की, जिसमें ब्राह्मण घर में नहीं जन्मे पुरुषों के लिए भी उपनयन संस्कार शामिल था। लेकिन यह सब गुरु, साधु और शास्त्र पर आधारित व्यापक दार्शनिक तर्क द्वारा समर्थित था। 35 इसके विपरीत, महिलाओं को सावित्री गायत्री मंत्र देने के श्रील प्रभुपाद के निर्णय में ऐसे स्पष्ट दार्शनिक शास्त्रीय आधार का अभाव है।
जैसा कि हमने ऊपर दिखाया है, इतिहास से पता चलता है कि श्रील प्रभुपाद ने शुरू में महिलाओं को मंत्र देने से इनकार कर दिया था। जब कुछ महिला शिष्य परेशान हो गईं और रोने लगीं, तो उन्होंने नरमी दिखाई और कहा कि महिलाओं द्वारा इस मंत्र को जपने में “कोई नुक्सान नहीं है,” हालाँकि उन्होंने उन्हें साथ में दिया जाने वाला पवित्र-धागा नहीं दिया। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि श्रील प्रभुपाद ने कभी भी अपने महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री देने को दार्शनिक रूप से उचित नहीं ठहराया, जैसा कि उन्होंने निम्न जन्म के पुरुषों को ब्राह्मण का दर्जा देने के मामले में बार-बार किया। 36 श्रील प्रभुपाद का निर्णय एक मूलभूत सैद्धांतिक परिवर्तन के बजाय एक तात्कालिक नैतिक दुविधा, या “धर्मसंकट” की प्रतिक्रिया से ही उपजा प्रतीत होता है।
वैष्णव धर्म में महिलाओं को आध्यात्मिक दृष्टि से पुरुष ब्राह्मण के बराबर माना जाता है , लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें सावित्री गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए या पवित्र-धागा पहनना चाहिए। श्रील प्रभुपाद के शुरुआती इनकार से पता चलता है कि मंत्र को महिलाओं की आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक आवश्यक सिद्धांत नहीं माना जाता था। अगर ऐसा होता, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें दे देते, जैसा कि उन्होंने पुरुषों के लिए किया था। इसके बजाय, दबाव में, उन्होंने इसे अनुमति देने में “कोई नुक्सान नहीं” देखा, जिसका अर्थ है कि मंत्र को महिलाओं की आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक नहीं माना गया था। यह भविष्य में महिलाओं को इसे देने की प्रथा को जारी रखने के लिए शायद ही कोई अल्प समर्थन है।
गुरु द्वारा स्वेच्छा से उचित दीक्षा में दिए गए मंत्रों से ही लाभ मिलता है; अन्यथा नहीं
वस्तुतः गुरु द्वारा स्वेच्छा से उचित दीक्षा के बिना दिए गए मंत्रों से कोई लाभ नहीं होता।
मन्त्रं दद्यात् सुसीद्धौ तु सहस्रं देशिको जपेत्।
यदृच्छया श्रुतं मन्त्रं छलेनाथ बलेन वा।
पत्रे स्थितं च गाथां च जनयेद् यद्यानर्थकम्।
दीक्षा के समय गुरु ( देशिक ) मंत्र का एक हजार जप करके शिष्य को देता है। जो मंत्र उचित दीक्षा के माध्यम से नहीं बल्कि आकस्मिक सुनने से या किसी को धोखा देने से, या बलपूर्वक या हिंसा से या लिखित कागज (या पत्ते) के माध्यम से, या पाठ्य छंदों के माध्यम से प्राप्त होता है, वह फल नहीं देता है।
अग्नि पुराण 293.20-21
इस प्रकार, शास्त्र के अनुसार, दबाव, बहिष्कार आदि के कारण दिए गए मंत्रों से कोई लाभ नहीं होता।
जैसे-जैसे हमारा ज्ञान बढ़ता है, हम अपनी क्रियाओं का पुनः परीक्षण करने के लिए बाध्य होते हैं
कुछ ऐसी मानक क्रियाएं हैं जिन्हें हम मानदंडों के रूप में बढ़ावा देने का लक्ष्य रखते हैं, और साथ ही कुछ अपवादरूप क्रियाएं भी हैं जिन पर हम पुनर्विचार कर सकते हैं। श्रील प्रभुपाद की वर्णाश्रम-धर्म की स्थापना करने की इच्छा हमें अपनी कुछ प्रथाओं की फिर से जांच करने के लिए मजबूर करती है, जिनका हम तब पालन करते थे जब हमें कम जानकारी थी। उदाहरण के लिए, इस्कॉन के शुरुआती दिनों में, आरती केवल मोमबत्तियाँ अर्पित करके की जाती थी। सिर्फ इसलिए कि प्रारंभिक दिनों में हम एक विशिष्ट प्रकार की समझ का पालन करते थे, इसका अर्थ यह नहीं कि परिष्कृत और सटीक समझ प्राप्त करने के बाद भी हम उन प्रारंभिक क्रियाओं का पालन जारी रखें। उदाहरणार्थ: अर्चन-पद्धति पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद अर्चा विग्रह की पूजा के प्रारंभिक मानक को बनाए रखने का कोई फायदा नहीं है , क्योंकि हम जानते हैं कि श्रील प्रभुपाद चाहते थे कि हम आगे बढ़ें। इसी प्रकार, जब हम दीक्षा के सही तरीके से अवगत हो गए हैं, तो 1970 की सम्झौतापूर्ण दीक्षा-प्रणाली पालन करने का कोई कारण नहीं है। हम यह भी उम्मीद कर सकते हैं कि अंततः इस्कॉन द्विज अपने द्विजत्व को गंभीरता से लेंगे और हरि-भक्ति-विलास में बताए गए संध्यावंदन को सीखेंगे, जो कि हमारे संप्रदाय का मानक है। यदि इस्कॉन उन प्रारम्भिक प्रणालियों में अटका रहना चुनता है जिनका हमने तब पालन किया जब हम बेहतर नहीं जानते थे तो इस्कॉन ऐसा कर सकता है। लेकिन भविष्य की पीढ़ियाँ अनिवार्य रूप से गुरु, साधु और शास्त्र के अनुसार अपनी आध्यात्मिक विरासत, परंपराओं और संस्कृति को अधिक गहराई से समझने की कोशिश करेंगी। इस तर्क को भी स्थापित किया जा सकता है कि श्रील प्रभुपाद द्वारा महिलाओं को पवित्र-धागा न देने का निर्णय भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक निहित संकेत था कि महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री देने की यह प्रथा जारी नहीं रहनी चाहिए।
स्त्रियों को ब्रह्मगायत्री देना बंद करना उचित है
ब्रह्मगायत्री देना बंद करना गलत नहीं है, अपितु यह बिल्कुल ही सही बात है, क्योंकि: 37
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शास्त्रों में स्त्रियों को ब्रह्मगायत्री देने का निषेध किया गया है।
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ब्रह्मगायत्री न देना शास्त्र सम्मत है।
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ब्राह्मणी (परम्परागत ब्राह्मण परिवारों की महिलाएं) इस मंत्र का जाप नहीं करती हैं।
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कोई भी प्रामाणिक सम्प्रदाय स्त्रियों को ब्रह्मगायत्री नहीं सिखाता।
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श्रील भक्तिसिद्धांत ने इसे किसी भी अपनी महिला शिष्याओं को नहीं दिया।
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श्रील प्रभुपाद अपनी महिला शिष्याओं को ब्रह्मगायत्री नहीं देना चाहते थे।
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वास्तव में अनिच्छुक श्रील प्रभुपाद ने अंततः इस्कॉन के इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर एक विद्रोही महिला गुट को शांत करने के लिए अपनी प्राथमिकताओं के विरुद्ध कार्रवाई की।
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श्रील प्रभुपाद ने स्त्रियों को पवित्र-धागा प्रदान नहीं किया जो उपनयन संस्कार का एक मूलभूत हिस्सा है।
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सांस्कृतिक पिछड़ेपन और अज्ञानता की स्थिति, जिसने श्रील प्रभुपाद को यह समझौता करने के लिए मजबूर किया, वह अब मौजूद नहीं है क्योंकि अब कई भक्त कृष्ण की वैदिक सभ्यता के अभ्यासों से अच्छी तरह से अवगत हो गए हैं, जैसा कि SAC के पेपर को मेरे जवाब के भाग 1 से स्पष्ट है।
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जिस प्रकार अकाल के समय व्यक्ति जीवित रहने के लिए निषिद्ध भोजन खा सकता है, लेकिन अकाल समाप्त होने पर उसे पुनः शुद्ध आहार पर लौटना पड़ता है। 38 उसी प्रकार, आपातकाल के दौरान व्यक्ति निषिद्ध कार्यों का सहारा ले सकता है, लेकिन आपातकाल समाप्त होने पर उसे पुनः सामान्य जीवन जीने पर आना ही होगा।
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वैष्णवीयों को इससे कोई हानि नहीं है।
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ब्रह्मगायत्री जपने से महिलाओं को आध्यात्मिक लाभ नहीं होता। यदि उन्हें लाभ होता तो श्रील प्रभुपाद इसे देने में संकोच नहीं करते।
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और यदि ब्रह्मगायत्री का जप करने से महिलाओं को वास्तव में आध्यात्मिक लाभ होता होता, तो इसका अर्थ यह होगा कि सभी पूर्ववर्ती आचार्य, शास्त्र और परंपराएं महिला भक्तों को आध्यात्मिक लाभ से वंचित कर रही थीं, जो कि वैदिक ज्ञान के ढांचे के भीतर अस्वीकार्य है।
वैष्णवीयों को ब्रह्मगायत्री मन्त्र प्राप्त न करने से कोई हानि नहीं है
वैष्णवीयों को कोई हानि नहीं है। क्यों? क्योंकि एकमात्र मंत्र जो उन्हें प्राप्त नहीं होगा वह है सावित्री-मंत्र ( ब्रह्म-गायत्री ), जो एक वैदिक मंत्र है। उन्हें अन्य सभी पांचरात्रिक मंत्र प्राप्त होंगे। इस प्रकार, वे अभी भी अर्चा-विग्रह पूजा 39 कर सकती हैं और भक्ति-शास्त्रों का अध्ययन कर सकती हैं क्योंकि, जैसा कि भाग 1 में चर्चा की गई है्, ब्रह्म-गायत्री का उपयोग पांचरात्रिक अर्चा-विग्रह पूजा में नहीं किया जाता है और न ही भगवद-गीता, श्रीमद्भागवतम, चैतन्य-चरितामृत, महाभारत, रामायण, पुराण, इत्यादि भक्ति-शास्त्रों का अध्ययन करने में ब्रह्मगायत्री मन्त्र अनिवार्य है। । तो इससे वैष्णवीयों को क्या हानि होगी ? कुछ भी नहीं।
अंतिम टिप्पणी
SAC ने अपनी थीसिस इस सिद्धांत पर आधारित की है कि श्रील प्रभुपाद ने महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री मंत्र इसलिए दिया क्योंकि यह उनके आध्यात्मिक जीवन के लिए फायदेमंद था। किन्तु, हमने स्थापित किया कि श्रील प्रभुपाद ने इसे किसी दूसरे कारण से दिया था, जिससे SAC की थीसिस निरस्त हो गई।
इस्कोन में स्त्रियों को ब्रह्म-गायत्री देने की चल रही प्रथा को सही ठहराने के लिए, SAC ने USA में पहली “ब्राह्मण-दीक्षा” के इतिहास को गलत ठहराया। गोविंद दासी ने पश्चिम में पहली ब्राह्मण-दीक्षा में शामिल न होने के अपने विवरण को बदल दिया। शुरू में, उन्होंने बताया कि वे ब्राह्मण दीक्षा समारोह में अनुपस्थ्ति रहीं क्योंकि वे नाराज थी कि प्रभुपाद स्त्रियों को ब्राह्मण-दीक्षा नहीं दे रहे — एक ऐसी भावना जिसे सत्स्वरूप दास गोस्वामी ने “नारीवादी विरोध” के रूप में वर्णित किया। लेकिन अभी अभी (2020 के दशक में), उन्होंने एक अलग स्पष्टीकरण पेश किया, जिसमें पुरुष भक्तों के दुर्व्यवहार को दोष दिया गया। इसी तरह, जदुरानी दासी ने अपने ऐतिहासिक विवरण को इस तरह बदल दिया कि पुरुषों पर उँगली उठे। यह इतिहास का पुनर्लेखन SAC की विश्वसनीयता को कम करता है, और अपनी स्थिति का समर्थन करने के लिए हेरफेर किए गए आख्यानों पर SAC की निर्भरता को उजागर करता है।
साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि श्रील प्रभुपाद ने इस्कॉन के इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर में अपनी विद्रोही महिला शिष्यों के असंतोष को दूर करने के साधन के रूप में उनको ब्रह्म-गायत्री मंत्र देना अपना कर्तव्य समझा। इस संदर्भ से पता चलता है कि यह निर्णय सिद्धांत-आधारित सैद्धांतिक परिवर्तन के बजाय परिस्थितिजन्य दबावों की प्रतिक्रिया थी।
इसके अलावा, SAC श्रील प्रभुपाद पर “दबाव डालने” की अवधारणा के बारे में पाखंडी दोहरे मानदंड का इस्तेमाल करता है। जब नारीवादियों को उन पर दबाव डालते हुए सटीक रूप से चित्रित किया जाता है, तो SAC ऐसे दावों को अपमानजनक और “अत्यधिक दुस्साहस्पूर्ण” कहकर उनकी निंदा करता है। लेकिन SAC को पुरुषों पर श्रील प्रभुपाद पर दबाव डालने का आरोप लगाने में कोई समस्या नहीं दिखती, क्योंकि यह उनके उद्देश्य को पूरा करता है।
गोविंद दासी के बदलते बयान SAC के तर्क की ईमानदारी को और कमज़ोर करते हैं। अपनी पसंदीदा स्थिति के हिसाब से बयान बदलने का उनका तरीका उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
कई ऐतिहासिक उदाहरण इस्कॉन की कुछ महिला अनुयायियों के बीच समस्याग्रस्त और विद्रोही व्यवहार को उजागर करते हैं। इसके अतिरिक्त, जैसा कि परिशिष्ट में प्रलेखित है , इस्कॉन के भीतर और बाहर दोनों जगह, नारीवादी अक्सर धोखाधड़ी को अपनी मुख्य युक्ति के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
प्रभुपाद द्वारा महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री मंत्र देने का निर्णय गौड़ीय वैष्णवता के इतिहास में एक अभूतपूर्व धर्म- संकट का द्योतक है। पश्चिमी प्रचार मिशन में अद्वितीय चुनौतियों का सामना करते हुए, श्रील प्रभुपाद ने स्वीकार किया, “पश्चिमी देशों में, मुझे कभी-कभी कुछ ऐसा करना पड़ता था जो मुझे नहीं करना चाहिए था। लेकिन मैंने बहुत सी आत्माओं को कृष्ण के पास लाने के लिए ऐसा किया है। “
जबकि श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने आध्यात्मिक अभ्यास में कुछ महत्वपूर्ण नवीनताएं प्रस्तुत की, ये हमेशा गुरु, साधु और शास्त्र में निहित व्यापक दार्शनिक तर्क द्वारा समर्थित थी। इसके विपरीत, श्रील प्रभुपाद ने महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री मंत्र देने के लिए कभी भी गुरु, साधु और शास्त्र पर आधारित दार्शनिक आधार नहीं दिया, जैसा कि उन्होंने “निम्न जन्म” के पुरुषों को ब्राह्मण का दर्जा देने के लिए किया था। उनकी रियायत एक तात्कालिक नैतिक दुविधा का व्यावहारिक जवाब थी, न कि एक मूलभूत सैद्धांतिक बदलाव।
महिलाओं को मंत्र देने में श्रील प्रभुपाद की शुरुआती अनिच्छा इस बात को रेखांकित करती है कि यह न तो उनकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक सिद्धांत था और न ही स्वाभाविक रूप से लाभकारी। अगर यह एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धांत होता, तो वे इसे बिना किसी हिचकिचाहट के महिलाओं को दे देते, जैसा कि उन्होंने पुरुषों के साथ किया था। इसके बजाय, उनका अंतिम निर्णय इस समझ पर आधारित था कि इसे देने में “कोई नुकसान नहीं” है — आवश्यक होने और “कोई नुक्सान न होने” में जमीन आसमान का फ़र्क है जो इस अभ्यास को जारी रखने के मामले को और कमजोर करता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इस्कॉन में महिलाएं ब्रह्म-गायत्री मंत्र न प्राप्त करके कुछ भी नहीं खोती। पांचरात्रिक अर्चा-विग्रह पूजा करने या भक्ति-शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए ब्रह्मगायत्री आवश्यक नहीं है, दोनों ही काम वे पहले से ही करती हैं। और जैसा कि अग्नि पुराण (293.20-21) हमें बताता है कि इस मंत्र का जाप करने से महिलाओं को कुछ भी हासिल नहीं होता है। इसलिए वे इसे न जपने से कुछ भी नहीं खोती हैं, और इसे जपने से उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता है।
इन कारणों से, हम महिलाओं को ब्रह्म-गायत्री मंत्र देने की प्रथा को बंद करने का सुझाव देते हैं। ऐसा परिवर्तन इस्कॉन को शास्त्र, कृष्ण की वैदिक सभ्यता और इसके रीति-रिवाजों, पारम्परिक धर्म, हमारे सम्प्रदाय के मानको, आचार्यों, और श्रील प्रभुपाद कि मूल इच्छा (कि महिलाओं को ब्राह्मण-दीक्षा न दी जाए) इन सब के समीप लाकर रख देगा।
SAC का भविष्य
SAC के बौद्धिक दुराचार के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को देखने के बाद, एक सवाल उठता है: SAC के साथ क्या किया जाना चाहिए? कई संभावित परिदृश्य हैं:
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SAC को भंग कर दिया जाए तथा उसकी जगह कोई नया बोर्ड भी नहीं बनाया जाए।
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SAC को पूरी तरह से नया रूप दिया जाए और इसमें नए, बौद्धिक रूप से ईमानदार पुरुष ब्राह्मणों को नियुक्त किया जाए (महिलाओं को नहीं)।
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SAC का प्रमुख इस्तीफा दे दे, लेकिन शेष सदस्य बने रहें।
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GBC अहस्तक्षेप दृष्टिकोण अपनाते हुए स्थिति को अपरिवर्तित छोड़ दे — जो कि उनका सामान्य कार्य है।
यह स्पष्ट है कि इस्कॉन इंडिया को SAC पर कोई भरोसा नहीं है, क्योंकि उसने SAC के विरोध में अपना खुद का “इस्कॉन इंडिया स्कॉलर्स बोर्ड” स्थापित किया है। इसके अतिरिक्त, स्वतंत्र विद्वान SAC को खुले तौर पर तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं। GBC यदि कोई प्रतिक्रिया करता है तो वह बहुत महत्वपूर्ण होगी, खासकर यदि वह अंतिम स्थिति को चुनता है। किसी भी मामले में कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इस्कॉन के SAC पर भरोसा नहीं कर सकता।
परिशिष्ट
धोखाधड़ी एक नारीवादी रणनीति है
SAC द्वारा किया गया यह वर्तमान धोखा कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि इस्कॉन के नारीवादी गुट और सामान्य रूप से नारीवादियों के व्यवहार का एक पैटर्न है (नीचे देखें)। अगर नारीवादियों के पास कोई मजबूत मामला होता तो उन्हें हर तरह की चालाकी, छल-कपट, धोखाधड़ी और झूठ का सहारा नहीं लेना पड़ता।
उर्मिला और तीसरा एलिप्सिस
SAC की अध्यक्ष उर्मिला दासी का बौद्धिक बेईमानी का इतिहास रहा है। इसका सबूत इस लेख “उर्मिला और तीसरा एलिप्सिस” से मिलता है, जिसमें बताया गया है कि उन्होंने अपने श्रोताओं को धोखा देने के लिए जानबूझकर श्रील प्रभुपाद को गलत तरीके से उद्धृत किया। उन्होंने प्रभुपाद की शिष्या के रूप में अपनी स्थिति का फायदा उठाकर उन कनिष्ठ भक्तों को गुमराह किया, जिन्होंने उन पर अपना विश्वास जताया था। उनके कार्यों का उद्देश्य नारीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाना था। उन्होंने SAC के इस पेपर में भी यही रणनीति अपनाई।
SAC के एक सदस्य ने छुपकर एक बदनाम नारीवादी ट्रैक्ट लिखा
2013 में भक्तरूप दास और माधवानंद दास ने एक शोधपत्र जारी किया जिसका शीर्षक था, “वैष्णवों के लिए शिक्षा और गुरुत्व के संबंध में कुछ साक्ष्य।” बाद में यह पता चला कि यह शोधपत्र हरि पार्षद दास द्वारा लिखा गया था, जो वर्तमान में SAC के मुख्य सदस्य हैं। इस शोधपत्र का बाद में निम्नलिखित निबंध में विश्लेषण किया गया: “वैष्णवों के लिए शिक्षा और गुरुत्व के संबंध में कुछ साक्ष्य” शोधपत्र का विश्लेषण
इस दस्तावेज़ में गोलोक-रंजन दास जिन लेखकों की आलोचना कर रहे थे उनके द्वारा की गई चालाकीपूर्ण रणनीति या “धोखाधड़ी” को पकड़ते है। वह आरोप लगाते हैं कि लेखक अपने तर्क को सही ठहराने के लिए अस्पष्ट स्रोतों और व्याख्याओं का चयन करते हैं, जो पारंपरिक गौड़ीय-वैष्णव शिक्षाओं के विपरीत हैं। उनका दावा है कि लेखकों ने अपने विचारों का समर्थन करने के लिए शास्त्रों में हेरफेर की, पाठकों को गुमराह किया और वैदिक संस्कृति में महिलाओं की भूमिका पर स्थापित सिद्धांतों को कमजोर किया।
और अब देखते हैं इस्कॉन के भीतर कुछ ऐतिहासिक उदाहरण जिसमें नारीवादी लोग “प्रतिष्ठा विध्वंस” की रणनीति में संलग्न हैं, जहां वे इस्कॉन में उनका विरोध करने वाले पुरुष भक्तों की प्रतिष्ठा को बर्बाद करने के लिए किसी भी अवसर का उपयोग करने से नहीं चूकतें।
इस्कॉन महिला मंत्रालय को खत्म करने की साजिश
नवंबर 1998 में, “अर्धबुद्धि दास” द्वारा लिखे गए लेख “इस्कॉन महिला मंत्रालय को समाप्त करने की साजिश” ने इस्कॉन में हलचल मचा दी, जिसमें वरिष्ठ पुरुष भक्तों पर महिला मंत्रालय को समाप्त करने की साजिश का आरोप लगाया गया था। (महिला मंत्रालय को बाद में रणनीतिक रूप से “वैष्णवी मंत्रालय” नाम दे दिया गया ) इस लेख ने कई निर्दोष भक्तों को क्रोधित कर दिया, जिससे तथाकथित अपराधियों के खिलाफ दुश्मनी और प्रतिशोध की भावना भड़क उठी। हालांकि, बाद में पता चला कि यह लेख खुद महिला मंत्रालय द्वारा रची गई एक विस्तृत साजिश का हिस्सा था।
यह घटना तब शुरु हुई जब महिला मंत्रालय के सदस्यों को पता चला कि वरिष्ठ भक्तों का एक समूह, जिसे “GHQ” के रूप में जाना जाता है, इस्कॉन में नारीवाद के उदय को संबोधित करने और GBC को एक दार्शनिक पत्र प्रस्तुत करने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए ऑनलाइन बैठक कर रहा था। अपने संपर्कों के माध्यम से, महिला मंत्रालय ने इस ऑनलाईन बैठक मंच को हैक कर सभी वार्तालापों के लेखों को हासिल कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक्स-मधुसूदनी राधा दासी (उर्फ़ ‘अर्धबुद्धि दास’) को एक उत्तेजक निबंध लिखने का आदेश दिया, जिसमें उन्होंने संदर्भ से बाहर इन वार्तालापों के उद्धरण लेकर GHQ के सदस्यों को सबसे नकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया ताकि उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सके।
जवाब में, GHQ ने “नोट्स फ्रॉम ए थिंक टैंक” शीर्षक से एक व्यापक खंडन लिखा, जिसने “अर्धबुद्धि दास” के लेख में किए गए दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। “नोट्स फ्रॉम ए थिंक टैंक” पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति स्थिति के पीछे की सच्चाई देख सकता है। इसके प्रकाशन के बाद, “इस्कॉन महिला मंत्रालय को समाप्त करने की साजिश” नामक लेख तब तक गुमनामी में चला गया जब तक कि वैष्णवी मंत्रालय ने इसे अपनी वेबसाइट पर पुनः प्रकाशित करके पुनर्जीवित नहीं किया। संयोग से, x-मधुसूदनी राधा दासी तब से नास्तिक बन गई हैं, इसलिए मैंने “x” का उपयोग किया है।
“महिला मंत्रालय” द्वारा इस साजिश को खारिज करने और इस्कॉन नारीवादियों द्वारा जारी गैसलाइटिंग के विस्तृत विश्लेषण के लिए, GHQ Reloaded देखें (इसमें “एक थिंक टैंक के नोट्स” भी शामिल हैं)।
वृन्दावन में घटी घटना
नवम्बर १९९९ में वृंदावन में इस्कॉन कृष्ण-बलराम मंदिर में एक विवाद छिड़ गया था, जिसे पार्वती दासी के नेतृत्व वाले नारीवादी गुट ने भड़काया था और सुधर्मा दासी (महिला मंत्री) ने समर्थन दिया था। उन्होंने एक ईमेल अभियान शुरू किया जिसमें झूठा दावा किया गया कि धार्मिक समारोह के दौरान महिलाओं पर हमला किया गया था। उन्होंने इन दावों का इस्तेमाल अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया कि महिलाओं को मंदिर अध्यक्ष, GBC और दीक्षा-गुरु जैसे पदों पर होना चाहिए।
कार्तिक उत्सव में मंगला आरती के दौरान दर्शन व्यवस्था को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था। पिछले वर्ष, एक समझौते के तहत पुरुषों और संन्यासियों को पहले प्रणाम करने की अनुमति दी गई थी, उसके बाद महिलाओं को। किन्तु, पार्वती दासी और महिलाओं के एक छोटे समूह ने इस व्यवस्था को बाधित कर दिया, स्वयं गर्भगृह के सामने वाले हिस्से में जबरदस्ती धक्का देकर घुसकर; वास्तव में यह स्थान पारंपरिक रूप से पुरुषों और संन्यासियों के लिए आरक्षित है। पार्वती ने मंदिर के अध्यक्ष महामन प्रभु को मौखिक रूप से गाली देना शुरू कर दिया और संन्यासियों को प्रणाम करने से, शारीरिक रूप से, रोक दिया।
जैसे-जैसे तनाव बढ़ता गया, ऐसी खबरें सामने आईं कि पार्वती और अन्य महिलाओं ने भड़काऊ कार्य किए। उन्होंने पुरुषों पर शारीरिक हमला किया और फ़िर पुरुषों के प्रतिकार को वीडियों में कैद करने की कोशिश की जिससे वे पुरुषों के द्वारा स्त्रियों पर किये जा रहे दुर्व्यवहारों के स्वयं के मनघड़न्त आरोपों का समर्थन कर सकें। अंततः समझौता हो जाने के बावजूद भी पार्वती ने प्रबंधन की अवहेलना जारी रखी, जिससे उत्सव का शांतिपूर्ण माहौल भंग हो गया।
इस मामले पर दीनबंधु प्रभु की विस्तृत रिपोर्ट के लिए लिंक पर क्लिक करें।
संयोगवश, इस घटना के कुछ समय बाद ही पार्वती दासी को जानलेवा आघात लगा और वे लम्बे समय तक कोमा में रहीं।
अग्रिम पठन सामग्री
नारीवादी कैसे धोखा देते हैं यह दिखाने वाले लेख/वीडियो
(कोई विशेष क्रम में नहीं)
लोपामुद्रा और अगस्त्य, ऋग्वेद 1.179, आचार्य वीरनारायण पांडुरंगी द्वारा
इस व्याख्यान में (माध्व संप्रदाय से) आचार्य वीरनारायण पांडुरंगी पश्चिमी नारीवादी विद्वानों द्वारा वैदिक ग्रंथों की गलत व्याख्याओं को संबोधित करते हैं। यह ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा को नारीवादी प्रतीक के रूप में चित्रित करने की आलोचना करते हैं, और इसके विपरीत आध्यात्मिक प्रथाओं में लोपमुद्रा की भूमिका के पारंपरिक दृष्टिकोण के लिए तर्क को प्रस्तुत करते है। वक्ता आधुनिक पूर्वाग्रहों को खारिज करते हुए प्रामाणिक वैदिक दृष्टिकोण के माध्यम से प्राचीन ग्रंथों की व्याख्या करने के महत्व पर जोर देते हैं, और वैदिक संस्कृति, परंपरा और मोक्ष जैसे आध्यात्मिक लक्ष्यों को समझने के लिए इन ग्रंथों के मूल्य पर जोर देते हैं।
नारीवादी कथा के समर्थन के लिए आंकड़ों में हेराफेरी करना।
यह लेख इस बात की आलोचना करता है कि घरेलू हिंसा के नारीवादी चित्रण का समर्थन करने के लिए आँकड़ों में किस तरह से हेरफेर किया जाता है। लेखिका का तर्क है कि नारीवादी-संरेखित शोधकर्ता अक्सर पुरुष पीड़ितों के बारे में डेटा को छोड़ देते हैं, जिससे घरेलू हिंसा की धारणा एक लैंगिक मुद्दे के रूप में विकृत हो जाती है। यह अभ्यास पक्षपातपूर्ण शोध, दोषपूर्ण नीति-निर्माण और लैंगिक रूढ़ियों को बढ़ावा देता है। लेख घरेलू हिंसा का अध्ययन करने और उसे संबोधित करने के लिए अधिक संतुलित और पारदर्शी दृष्टिकोण का आह्वान करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी पीड़ितों का प्रतिनिधित्व किया जाए। यह एक अद्भुत संसाधन है जिसमें इसी तरह के अन्य लेखों के कई उपयोगी लिंक हैं।
सिमोन डी बोवुआर के राक्षसी झूठ
डॉ. जेनिस फियामेंगो द्वारा सिमोन डी ब्यूवोइर की द सेकेंड सेक्स का विश्लेषण नारीवादी क्लासिक की दार्शनिक और वैचारिक खामियों की तीखी आलोचना प्रस्तुत करता है। फियामेंगो का तर्क है कि नारीवादी विचार पर इसके प्रभाव के बावजूद, यह काम अशुद्धियों, चुनिंदा रीडिंग और गलत प्रस्तुतियों से भरा हुआ है, जिनमें से सभी ने नारीवाद के लिए एक हानिकारक विरासत के रूप में योगदान दिया है।
प्रारंभिक नारीवाद में पीड़ित होने का क्रेज: एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन का मामला
नारीवादी आइकन एलिज़ाबेथ कैडी स्टैंटन का जीवन इस बात का उदाहरण है कि नारीवाद एक पीड़ित मानसिकता का विकार है, दूसरे शब्दों में यह एक ऐसे भ्रम को जन्म देता है और बढ़ाता है जो दूसरों के प्रति सहानुभूति को कम करता है। यह आधुनिक नारीवादी आंदोलन की बीमारी का प्रमाण है कि नारीवादी इतिहासकारों ने स्टैंटन की वकालत के केंद्र में प्रतिशोधी पुरुष-विरोधी उत्साह और आत्म-दया के जुनून पर कभी आपत्ति नहीं जताई।
नारीवाद की झूठी उत्पत्ति की कहानी: वोट के लिए संघर्ष
डॉ. जेनिस फियामेंगो का तर्क है कि महिलाओं के मताधिकार के बारे में नारीवादी टिप्पणी भ्रामक है। उनका तर्क है कि वोट के लिए संघर्ष व्यापक स्त्री-द्वेष पर काबू पाने के बारे में कम और लोकतांत्रिक अधिकारों के क्रमिक विस्तार के बारे में अधिक था, जिसने कई पुरुषों को भी प्रभावित किया जो शुरू में वोटहीन थे। लेख इस विचार की आलोचना करता है कि नारीवाद महिलाओं के मताधिकार के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार था, यह सुझाव देते हुए कि यह पीड़ित मिथ्या कथाओं पर जोर देने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करता है।
नारीवाद का सबसे बड़ा अंध-बिंदु उजागर हुआ
डॉ. क्रिस्टीना हॉफ सोमर्स अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट में एक दर्शनशास्त्र प्रोफेसर से एक लेखिका बनने तक के अपने विकास पर चर्चा करती हैं, जिसमें नारीवाद और लैंगिक राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया गया है। वह नारीवादी सिद्धांत के प्रति अपने शुरुआती उत्साह को याद करती हैं, जो बाद में कट्टरपंथी नारीवादी ग्रंथों का सामना करने पर मोहभंग में बदल गया। इन ग्रंथों में लैंगिक उत्पीड़न के बारे में अतिरंजित और विकृत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया था, जिसमें विश्वसनीय डेटा का अभाव था और हानिकारक निष्कर्षों की ओर ले जाता था।
नारीवादी झूठ, मिथकों और विकृतियों को उजागर करने वाली लघु वीडियो की एक श्रृंखला।
फियामेंगो फ़ाइल
डॉ. जेनिस फियामेंगो द्वारा नारीवादी बौद्धिक बेईमानी को उजागर करने वाली वीडियो की एक श्रृंखला।
अपनी शुरुआत में, नारीवादी आंदोलन ने, यौन क्रांति के साथ, महिलाओं से कई आकर्षक, रोमांचक वादे किए। ये वादे अच्छे लगे, इतने अच्छे कि कई महिलाओं ने अपने पुरुषों और अपने बच्चों को छोड़ दिया या “खुद” और कैरियर की तलाश में शादी और परिवार की पूरी अवधारणा को अस्वीकार कर दिया। ये प्रयास, जो आत्मनिर्भरता और व्यक्तिवाद पर जोर देते थे, एक महिला के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने और उसके विकल्पों को बेहतर बनाने के साथ-साथ पुरुषों के साथ उसके संबंधों को बेहतर बनाने वाले थे। अब महिलाओं को इस तथ्य का सामना करना पड़ा है कि, कई मायनों में, नारीवाद और मुक्ति ने ऐसे वादे किए जिन्हें पूरा नहीं किया जा सका।
ओ’फॉलेन ने नारीवाद की बेईमानी को उजागर किया
जॉन वाटर्स ने नुआला ओ’फॉलेन के नारीवादी रुख की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि उनका काम अनजाने में नारीवाद की बौद्धिक बेईमानी को उजागर करता है। उनका तर्क है कि नारीवादियों ने खुद को सभी महिलाओं की एकमात्र आवाज़ के रूप में स्थापित कर लिया है, जिससे एक ऐसी संस्कृति बन गई है जहाँ नारीवाद की आलोचना करना पूरी तरह से महिलाओं पर हमला करने के बराबर है। वाटर्स का तर्क है कि उनके और केविन मायर्स के लेखन के बारे में नारीवादियों को जो बात वास्तव में “अपमानित” करती है, वह उनका लहज़ा नहीं है, बल्कि यह तथ्य है कि नारीवादी हठधर्मिता के खिलाफ़ उनके तर्क जवाबदेह नहीं हैं, जो आंदोलन की वैध आलोचना को संभालने में असमर्थता को उजागर करता है।
कैथी यंग: यूवीए विफलता और ‘पीड़ित शिकार पर विश्वास करो’ सिंड्रोम
यंग ने वर्जीनिया विश्वविद्यालय में बलात्कार के झूठे आरोपों का विश्लेषण किया है और बताया है कि किस प्रकार नारीवादियों ने उनका उपयोग एक कथानक को आगे बढ़ाने के लिए किया।
ग्रन्थसूची
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फ़ुटनोट्स
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एनागो अकादमी, “वैज्ञानिक अनुसंधान में डेटा मसाजिंग: यह कब बहुत आगे बढ़ जाता है?” (2018): 12 दिसंबर, 2024 को एक्सेस किया गया, https://www.enago.com/academy/data-massaging-in-scientific-research/ . ↩︎ ︎
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जॉर्ज ऑरवेल, 1984 (न्यूयॉर्क: द न्यू अमेरिकन लाइब्रेरी, 1963), 204. यह भी देखें http://george-orwell.org/1984/18.html ↩︎ ︎
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देखें, जेनिस फियामेंगो, “जब नारीवादी अतीत को नियंत्रित करते हैं – TFF एपिसोड 53.” (2016): 12 दिसंबर, 2024 को एक्सेस किया गया, https://www.youtube.com/watch?v=Nt00Y1GW7EQ . ↩︎ ︎
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वे परेशान थीं, यह दर्शाता है कि उनमें अभी भी नारीवाद का एक मजबूत प्रभाव था, हालांकि उन्होंने कृष्ण चेतना की प्रथाओं को स्वीकार किया था। आखिरकार, “कोई अचानक किसी समुदाय के सामाजिक रीति-रिवाजों को नहीं बदल सकता।” कृष्ण की वैदिक संस्कृति की एक लड़की ने इस तरह से प्रतिकार नहीं किया होता। ↩︎ ︎
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यह निश्चित रूप से वैष्णव-अपराध के अंतर्गत आता है, और SAC इसके प्रचार में सहभागी है। ↩︎ ︎
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श्यामसुंदर दास, “ब्रह्मानंद प्रभु “हमारे मिशन का पर्वत”।” (2015): 11 दिसंबर, 2024 को एक्सेस किया गया, https://shyamasundaradasa.com/jyotish/resources/articles/informal_articles/brahmananda.html . ↩︎ ︎
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कमरे में बातचीत—6 जनवरी, 1976, बम्बई ↩︎ ︎
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सत्स्वरूप दास गोस्वामी, श्रील प्रभुपाद-लीलामृत, खंड 2: कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए सी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की जीवनी, (लॉस एंजिल्स: भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट, अध्याय 58. (यह पृष्ठ संख्या के बिना एक ई-बुक है।)
https://vedabase.io/en/library/spl/2/58 और https://archive.org/details/prabhupada-lilamrta-compl/page/1302/mode/1up भी देखें ↩︎ ︎ -
सत्स्वरूप दास गोस्वामी, “IX: द बोस्टन ब्राह्मणस्” , लिविंग विद द स्क्रिप्चर्स (फिलाडेल्फिया: गीता-नागरी प्रेस, 1984) में। ↩︎ ︎
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ब्राह्मण-दीक्षा, दी और नहीं भी दी। इसकी तुलना अंबरीष महाराज की उस स्थिति से की जा सकती है जिसका सामना उन्होंने तब किया जब दुर्वासा मुनि उस समय प्रकट हुए जब उन्हें अपने एकादशी व्रत का पारण करना था। वे दुविधा में थे कि कैसे अपना पारण करें और साथ ही अपने अतिथि के खाने से पहले कुछ न खाएँ। विद्वान ब्राह्मण ने उन्हें सलाह दी कि व्रत तोड़ने की औपचारिकता निभाने के लिए थोड़ा पानी पी लें लेकिन साथ ही इसे खाना नहीं माना जाता। इस तरह उन्होंने एक साथ अपना एकादशी व्रत पारण भी किया और खाया भी नहीं। विस्तृत जानकारी के लिए श्रीमद्भागवतम् 9.4.38-40 देखें ↩︎ ︎
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व्यक्तिगत संचार. ↩︎ ︎
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ईसा ब्लागडेन, द क्राउन ऑफ़ ए लाइफ़ (वॉल्यूम 3) (लंदन: हर्स्ट एंड ब्लैकेट, 1869), 155. ↩︎ ︎
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बैक टू गॉडहेड, “श्रील प्रभुपाद का अनुसरण करते हुए।” (2007): 5 दिसंबर, 2024 को एक्सेस किया गया, https://www.backtogodhead.in/following-srila-prabhupada/ . ↩︎ ︎
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सिद्धांत दास, “सिद्धांत की कहानी।” 5 दिसंबर, 2024 को एक्सेस किया गया, https://prabhupadamemories.com/siddhanta.html . ↩︎ ︎
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व्यक्तिगत पत्राचार. ↩︎ ︎
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जय अद्वैत स्वामी, “पुस्तक परिवर्तन: इतिहास बीबीटी का समर्थन करता है।” (2010): 23 नवंबर, 2024 को एक्सेस किया गया, https://www.jswami.info/gita_editing_history/#https://jswami.info/editing/hayagriva . ↩︎ ︎
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औपरोक्त स्रोत↩︎ ︎
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जय अद्वैत स्वामी, “बुक चेंजेस: हिस्ट्री रियली डज़ बैक द बीबीटी.” (2010): 23 नवंबर, 2024 को एक्सेस किया गया, https://www.jswami.info/book_changes_history_really_does_back_bbt/ . ↩︎ ︎
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दास श्रुतकीर्ति, कठिनाई क्या है (रेडलेट, यूके: धर्म प्रकाशन, 2006), 177-78. ↩︎ ︎
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श्यामसुंदर दास, “ज्योतिषी की डायरी से: रात के डकैतों ने श्रीमती राधारानी को चुरा लिया।” (2019): 11 दिसंबर 2024 को एक्सेस किया गया, https://shyamasundaradasa.com/jyotish/resources/articles/formal_articles/cora_prasna.html। ↩︎ ︎
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भक्ति विकास स्वामी, माताएं और गुरु (सूरत: भक्ति विकास ट्रस्ट, 2016), 80-83. ↩︎ ︎
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उदाहरण के लिए देखें: कक्ष वार्तालाप वर्णाश्रम प्रणाली शुरू की जानी चाहिए – 14 फरवरी, 1977, मायापुर ↩︎ ︎
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GBC रिसोल्यूशन 453.03 #3 2023 के अनुसार, वर्णाश्रम की अब आवश्यकता नहीं है। ↩︎ ︎
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श्रील प्रभुपाद का पत्र: गौरसुन्दर – लॉस एंजिल्स 17 दिसंबर, 1968 ↩︎ ︎
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श्रील प्रभुपाद का पत्र: माधवी लता दासी – लॉस एंजिल्स 28 दिसंबर, 1968 ↩︎ ︎
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यह मानना अनुचित नहीं है कि श्रील प्रभुपाद ने इस्कॉन में लड़कियों का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि वे चाहते थे कि उनके शिष्य भक्तों से विवाह करें, गैर-भक्तों से नहीं। ↩︎
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यह ऊपर दिए गए बिंदु को सुदृढ़ करता है जहाँ श्रील प्रभुपाद ने कहा था कि कुछ महिलाएँ पुरुषों को विवाह के लिए आकर्षित करने के लिए आकर्षक तरीके से कपड़े पहन रही थीं, जिससे कुछ संन्यासियों का पतन हुआ. ↩︎ ︎
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श्रीमद्भागवत 10.1.34-55 ↩︎ ︎
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लेकिन एक बार आपातकाल समाप्त हो जाने पर व्यक्ति को उचित मानकों पर लौटना होगा। ↩︎ ︎
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नीतिशास्त्र राजनीति विज्ञान, नैतिकता, कल्याण और आचरण, शाही जिम्मेदारियों, उचित व्यवहार और निर्णय लेने के सिद्धांतों या नियमों के प्राचीन वैदिक ग्रंथों को संदर्भित करता है, जो अक्सर धार्मिकता और न्याय के संदर्भ में होते हैं। यह अर्थशास्त्र (अर्थशास्त्र, शासन कला और सैन्य रणनीति) और धर्मशास्त्र (धार्मिक कानून) से निकटता से जुड़ा हुआ है। ↩︎ ︎
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वी.के.सुब्रमण्यन, चाणक्य के सिद्धांत। भारतीय मैकियावेली की क्रिस्टलीकृत बुद्धि (नई दिल्ली: शक्ति मलिक, अभिनव प्रकाशन, 1980), 117. ↩︎ ︎
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उदाहरण के लिए देखें, नृसिंह पूर्व तापनीय उपनिषद् 1.7 ↩︎ ︎
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“परिषद्” विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की समिति है, जो धर्म के कठिन प्रश्नों पर निर्णय करने के लिए गठित की गई है। मनु संहिता 12.110-111 देखें। ↩︎ ︎
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यदि ऐसा तर्क रखा जाए कि हम पंचतंत्र का पालन नहीं करते हैं, यह प्रामाणिक नहीं है” तो हमारा उत्तर यह है कि पंचतंत्र एक अत्यंत सम्मानित नीतिशास्त्र है (पिछला नोट देखें) जो श्रील रूप गोस्वामी सहित कृष्ण की वैदिक संस्कृति के अनुयायियों के द्वारा अच्छी तरह से जाना जाता था, जिनले उपदेशामृत का श्लोक 4 पंचतंत्र 4.13 के समान है। ↩︎ ︎
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उदाहरण के लिए देखें – श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर, ब्राह्मण और वैष्णव, अनुवाद, भूमिपति दास (नई दिल्ली: व्रजराज प्रेस, 1999). ↩︎ ︎
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नीच जन्म वाले पुरुषों को ब्राह्मण का दर्जा देकर वे श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के दार्शनिक पदचिन्हों का अनुसरण कर रहे थे। ↩︎ ︎
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यदि ऐसी आपत्ति उठाते है कि श्रील प्रभुपाद ने ब्रह्म-गायत्री दीक्षा के मानकों में कोई बदलाव नहीं किया, तो हमें भी ऐसा नहीं करना चाहिए। उस तर्क के अनुसार तो फ़िर हमें नेतृत्व के मानकों में कोई बदलाव नहीं करना चाहिए। श्रील प्रभुपाद ने महिलाओं को गुरु, GBC, या मंदिर अध्यक्ष नहीं बनाया. ↩︎ ︎
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बलदेव, बादरायण के वेदांतसूत्र: बलदेव (गोविंद भाष्य) की टिप्पणी के साथ , अनुवाद, श्रीश चंद्र वासु (नई दिल्ली: मुंशीराम मनोहरलाल पब्लिशर्स, 1979), 641-44. ↩︎ ︎
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पंचरात्र आगम के अनुसार महिलाएँ और शूद्र घर पर अर्चविग्रह की पूजा कर सकते हैं। लेकिन अगर महिलाएँ मंदिर में अर्चविग्रह की पूजा करती हैं तो इसे “मंदिर मानक” नहीं बल्कि निम्न “घर मानक” माना जाना चाहिए। इस विषय पर अधिक विस्तृत चर्चा के लिए इस लेख का दूसरा भाग देखें:
श्यामसुंदर दास, “ज्योतिषी की डायरी से: जिस रात डाकुओं ने श्रीमती राधारानी को चुरा लिया।” (2019): 11 दिसंबर, 2024 को एक्सेस किया गया, https://shyamasundaradasa.com/jyotish/resources/articles/formal_articles/cora_prasna.html. ↩︎ ︎